मयूख-मरु

Puraanic contexts of words like Maya, Mayuura / peacock, Mareechi, Maru etc. are given here.

मयूख स्कन्द ४.१.४९.३०(मयूखादित्य का माहात्म्य, सूर्य द्वारा शिव – पार्वती की स्तुति), ४.२.८४.६१(मयूखमाली तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ) mayookha/ mayuukha/ mayukha

 

मयूर गणेश १.८३.२(परशुराम द्वारा मयूरेश्वर स्थान पर गणेश की आराधना से परशु की प्राप्ति), १.८७.४४(गणेश द्वारा स्व वाहन मयूर स्कन्द को प्रदान करने का उल्लेख), २.१.१९(त्रेता युग में गणेश का मयूर वाहन), २.७८.४२(मयूरेश्वर : त्रेतायुग में षड्भुज मयूरारूढ गणेश का नाम), २.९८.४७(सर्पों के नाश हेतु विनता द्वारा मयूर को उत्पन्न करने की कथा, गुणेश द्वारा मयूर को स्ववाहन बनाने का वृत्तान्त), गरुड १.५५(त्विष्टिम दानव वध के लिए श्रीहरि का मयूर अवतार), पद्म ६.८८.१४(गरुड के पतित पंख से मयूर, नकुल व चाष की उत्पत्ति का कथन), ब्रह्माण्ड २.३.१०.४७(वायु द्वारा स्कन्द को मयूर, कुक्कुट व पताका देने का उल्लेख), भविष्य २.२.२.३०(मयूर के ब्रह्मा की मूर्ति होने का उल्लेख), मार्कण्डेय १५.२९(वर्णों के हरण पर मयूर योनि प्राप्ति का उल्लेख), वामन ५७.१०२(गरुड द्वारा स्वपुत्र मयूर को कार्तिकेय को समर्पित करना), वायु ४२.७०(गङ्गा द्वारा प्लावित पर्वतों में से एक), ७२.४६/२.११.४६(वायु द्वारा स्कन्द को मयूर, कुक्कुट व पताका उपहार देने का उल्लेख), विष्णु ३.१८.८३(शतधनु राजा द्वारा श्वान, बक आदि योनियां धारण करने के पश्चात् मयूर योनि में जन्म, पत्नी शैब्या द्वारा अवभृथ स्नान कराने से मयूर योनि त्याग कर जनक – पुत्र रूप में जन्म), ५.३३.३(बाणासुर की मयूर ध्वज के भङ्ग होने पर युद्ध होने का उल्लेख), विष्णुधर्मोत्तर १.१८८.७(१३वें मन्वन्तर में मयूर रूपी विष्णु द्वारा टिट्टिभ वध का कथन), १.२२१.८(मरुत्त के यज्ञ में इन्द्र द्वारा गृहीत रूप, मयूर को वर), स्कन्द ४.१.४५.३५(मयूरी : ६४ योगिनियों में से एक), ४.२.५३.८०(शिव द्वारा मयूर प्रमथ गण का दिवोदास – पालित काशी में प्रेषण, स्वनाम ख्यात लिङ्ग की महिमा), ५.१.३४.७१(गौरी द्वारा कार्तिकेय को मयूर वाहन देना), ५.३.६(प्रलय काल में शिव के मयूर रूप का वर्णन), ५.३.१३.४४(१५वें कल्प मायूर का कथन), योगवासिष्ठ १.१७.२६(चिन्ता की बर्हिणी/मयूरी से उपमा), १.३१.४(लोभ रूपी मयूर), ६.२.११८.१६(मयूर द्वारा इन्द्र से जल की याचना, सर्प से वैर आदि की गुणी जनों के स्वभाव से तुलना), वा.रामायण ७.१८.५(राजा मरुत्त के यज्ञ में इन्द्र का मयूर में प्रवेश, मयूर को वरदान), लक्ष्मीनारायण ३.२४.३(ब्रह्मा से उत्पन्न मयूर असुर के नाश हेतु श्रीक्षत्रनारायण के अवतार का वृत्तान्त),   ३.१६४.८७(देवसावर्णि नामक १३वें मन्वन्तर में टिट्टिभ असुर के वधार्थ श्रीहरि द्वारा मायूर रूप धारण का कथन), ३.१९५.१(मायूर पुरी में मत्स्या नदी के तट पर हर्षुल भक्त का वृत्तान्त), ३.२०१.३(कथा के उच्छिष्ट भक्षण से मयूर का हारीतक शूद्र के भक्त पुत्र रूप में जन्म का वृत्तान्त), कथासरित् १२.४.५०(मृगाङ्कदत्त के मन्त्री भीमभट को स्त्री द्वारा मयूर बनाने व मयूरत्व से मुक्ति का वृत्तान्त ) mayoora/mayuura/ mayura

 

मयूरध्वज भविष्य ३.३.२०.३(बलवर्धन व जलदेवी – पुत्र, लहर – अनुज, स्कन्द की आराधना से बल प्राप्ति), ३.३.३२.५०(विराट् का अंश, कुरुक्षेत्र में युद्धार्थ आगमन), ३.३.३२.७८(मयूरध्वज का पृथ्वीराज – सेनानी लहर राजा से युद्ध ) mayuuradhwaja/ mayuradhwaja

 

मयोभुव मत्स्य २०२.२(अगस्त्य कुल के त्र्यार्षेय प्रवर प्रवर्तक ऋषियों में से एक )

 

मरकत पद्म ६.६.२७(बल असुर के मेद से मरकत की उत्पत्ति का उल्लेख), स्कन्द १.३.१.७.३(कलियुग में मरकताचिल के लिङ्ग? बनने का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ३.१६३.२९(बल असुर के पित्त समिद्बीज के पतन से मरकत की उत्पत्ति का कथन ) marakata

 

मरिच स्कन्द ६.२५२.२२(चातुर्मास में किन्नरों की मरिच वृक्ष में स्थिति का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.४४१.८४(मरिच वृक्ष : किन्नरों का रूप ) maricha

 

मरीचि अग्नि २०? (सम्भूति व मरीचि से पौर्णमास पुत्र के जन्म का उल्लेख), ११४.११(ब्रह्मा – पुत्र मरीचि द्वारा स्वभार्या धर्मवती को शिला बनने का शाप तथा धर्मवती द्वारा प्रतिशाप की कथा), गणेश २.४५.४(मरीचि द्वारा मन्दार मूल में तप, शिव द्वारा वरदान), २.८५.१(मरीचि – पठित गणेश कवच का वर्णन), गरुड १.२१.७, ३.७.४९(मरीचि द्वारा हरि स्तुति), देवीभागवत ४.२२, ९.२१.३२, नारद १.९१.६५(ईशान शिव की चतुर्थ कला), पद्म १.१६.९८(ब्रह्मा के यज्ञ में उद्गाता), ब्रह्मवैवर्त्त १.२२.६(ऋषि मरीचि की उत्पत्ति), २.५१.१७(सुयज्ञ नृप द्वारा अतिथि तिरस्कार पर मरीचि द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया), ब्रह्माण्ड १.१.५.७४(मरीचि का ब्रह्मा के चक्षु से प्राकट्य), १.२.९.५५(सम्भूति – पति), १.२.११.१०(मरीचि प्रजापति व सम्भूति के पुत्र व कन्याओं के नाम), १.२.३२.९६(ब्रह्मा के मन से उद्भूत १० ऋषियों में से एक), २.३.१.२१(ब्रह्मा के ८ पुत्रों में से एक), २.३.१.४३(ब्रह्मा के शुक्र होम से मरीचि की उत्पत्ति, अत्रि – पुत्र बनना?), २.३.६.५(दनु के प्रधान पुत्रों में से एक), २.३.७.२४४(मरीचिमान् : वालि के सामन्त प्रधान वानर सेनापतियों में से एक), भागवत १.६.३१(मरीचि आदि ऋषियों की ब्रह्मा के प्राणों से उत्पत्ति का उल्लेख), ३.१२.२४(मरीचि ऋषि की ब्रह्मा के मन से उत्पत्ति का उल्लेख), ३.२४.२२(कर्दम – पुत्री कला के मरीचि की पत्नी बनने का उल्लेख), ४.१.१३(मरीचि व कला से कश्यप व पूर्णिमा की उत्पत्ति का उल्लेख), ५.१५.१५(सम्राट् व उत्कला – पुत्र, बिन्दुमती – पति, बिन्दुमान् – पिता, गय वंश), ९.१.१०(मरीचि ऋषि की ब्रह्मा के मन से उत्पत्ति का उल्लेख), १०.८५.४७(मरीचि व ऊर्णा के षड्गर्भ संज्ञक ६ पुत्रों का वृत्तान्त), मत्स्य ३.६(ब्रह्मा के १० मानस पुत्रों में ज्येष्ठ), १२७.१६(तारा संख्या के बराबर मरीचियों की संख्या का उल्लेख), १९५.९(परमेष्ठी ब्रह्मा के शुक्र के होम से मरीचियों से मरीचि की उत्पत्ति का उल्लेख), १९६.१(मरीचि – तनया सुरूपा के पुत्रों का वृत्तान्त), २५०.४(कौस्तुभ मणि की मरीचियों का उल्लेख), वामन ३०.३७(), ८९.४६(मरीचि द्वारा वामन को पालाश दण्ड देने का उल्लेख), वायु २८.९(मरीचि व सम्भूति से उत्पन्न पुत्र व कन्याओं के नाम), ५२.९५(मरीचि की शिशुमार की पुच्छ में स्थिति का उल्लेख), ६५.१०९/२.४.१०९(मरीचि वंश का वर्णन), ६६.१०५/२.५.१०१(स्वयंभु के राजसी पौरुषी तनु से मरीचि कश्यप के जन्म का उल्लेख), ६८.५/२.७.५(मरीचिरक्षक : दनु व कश्यप के प्रधान दानव पुत्रों में से एक),  १००.६३/ २.३८.६३(मरीचि देवगण के अन्तर्गत १२ देवों के नाम), १०७/२.४५(मरीचि ऋषि द्वारा स्व पत्नी धर्मव्रता को शाप से शिला बनाना, पत्नी द्वारा प्रतिशाप), ११२.३६/२.५०.४५(शिव वन में प्रवेश से मरीचि को शिव से शाप की प्राप्ति, शुक्ल से कृष्ण होना, गया में शिला पर तप से कृष्णता का निवारण), विष्णु १.७.५(ब्रह्मा के ९ मानस पुत्रों में से एक), १.१०.६(मरीचि व सम्भूति से पौर्णमास तथा विरजा पत्नी? से पर्वत पुत्र के जन्म का उल्लेख), १.११.४३(मरीचि ऋषि द्वारा ध्रुव को परम पदप्राप्ति के उपाय का कथन), २.८.१९(ब्रह्म सभा से सूर्य की मरीचियों के प्रतीप गमन का उल्लेख), शिव ७.१.१७.२२(सम्भूति – पति, पौर्णमास नामक पुत्र व ४ कन्याओं के पिता), स्कन्द ४.१.१९.१०९(मरीचि द्वारा ध्रुव को परम पद प्राप्ति हेतु अच्युत विष्णु की आराधना करने का निर्देश), ४.१.५०.४(मारीच कश्यप की पत्नियों कद्रू व विनता का वृत्तान्त), ४.२.९७.११६(मरीचीश कुण्ड का संक्षिप्त माहात्म्य : पापनाशक), ५.१.४६.३ (मरीचि – पुत्र कश्यप का वर्णन), ५.३.४०.३(ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि), ५.३.१९४.५४(श्री व विष्णु के विवाह यज्ञ में मरीचि ऋषि के उद्गाता ऋत्विज बनने का उल्लेख), ६.१८०.३३(ब्रह्मा के यज्ञ में अच्छावाक् ऋत्विज होने का उल्लेख), ७.१.२३.९३(ब्रह्मा के शिवलिङ्ग स्थापना यज्ञ में उद्गाता), ७.४.१४.४७ (पञ्चनद तीर्थ में मरीचि ऋषि के पावनार्थ गोमती नदी के आगमन का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.२४८(मरीचि – शिष्य वरूथ का उद्धार करने वाली वरूथिनी एकादशी ), १.३८२.१८१(मरीचि के पुत्र पौर्णमास व ४ कन्याओं तुष्टि, वृष्टि, कृष्टि, अपचिति का उल्लेख),  कथासरित् १०.३.५३, द्र. वंश भरत, षड्गर्भ mareechi/ marichi

 

मरीचिगर्भ ब्रह्माण्ड ३.४.१.५८(मेरुसावर्णि मनु के पुत्रों के गण के अन्तर्गत १२ नाम), भागवत ८.१३.१९(नवें मनु दक्षसावर्णि के काल में देवों के २ गणों में से एक), वायु ७३.३८/२.११.८१(पितरों के मरीचिगर्भ लोक का उल्लेख), विष्णु ३.२.२१(नवें मनु दक्षसावर्णि के काल के देवों के ३ गणों में से एक ) mareechigarbha/ marichigarbha

 

मरु पद्म ६.६९.१५(दासरक देश में मरु देश में वणिक् व प्रेत के संवाद का वृत्तान्त), ब्रह्माण्ड २.३.६३.२१०(शीघ्र| – पुत्र, प्रभुसुत – पिता, कलाप ग्राम में स्थिति, १९वें युग में क्षत्र प्रवर्तक), २.३.६४.११(हर्यश्व – पुत्र, प्रतिम्बक – पिता, निमि वंश), ३.४.१.८१(११वें सावर्णि मनु के ९ पुत्रों में से एक), ३.४.४४.९८ (लिपि स्थानों में न्यास हेतु पीठों में से एक), भागवत ९.१२.५(शीघ्र| – पुत्र, कलाप ग्राम में निवास, वंश प्रवर्तक), ९.१३.१५(हर्यश्व – पुत्र, प्रतीपक – पिता, निमि वंश), १२.३.३७(इक्ष्वाकु वंशी योगी मरु के कलाप ग्राम में स्थित होने तथा कलियुग के अन्त में पुन: प्रकट होने का कथन), मत्स्य ११.२६(सूर्य – पत्नी संज्ञा द्वारा वडवा रूप धारण कर पृथिवी पर मरु देश में जाने का उल्लेख), वायु ८८.३५/२.२६.३५(मरुधन्व प्रदेश में बालुका में स्थित धुन्धु राक्षस का वृत्तान्त), ८९.११/२.२८.११(हर्यश्व – पुत्र, प्रतित्वक – पिता, निमि वंश), विष्णु ४.४.१०८(शीघ्र|ग – पुत्र, आगामी युग में क्षत्र वंश के प्रवर्तन से पूर्व

कलाप ग्राम में स्थिति का कथन), स्कन्द ४.२.६९.१५९(मरुकेश्वर लिङ्ग अर्चना से राक्षस भय नाश का उल्लेख), हरिवंश १.५१.२८(मृगों द्वारा मरु साधना करने का कथन), वा.रामायण ६.२२.४०(मरुकान्तार : राम के बाण से समुद्र का शुष्क प्रदेश), लक्ष्मीनारायण १.३१३.२(मरुदेश के ब्राह्मण – द्वय के धन का नाश होने और अधिक मास द्वितीय पक्ष षष्ठी व्रत के प्रभाव से महेन्द्र व जयन्त आदि बनने का वृत्तान्त), १.३८९(आग्नीध्र – पुत्र नाभि की पत्नी मरुदेवी की पतिभक्ति), ४.८०.१७(राजा नागविक्रम के यज्ञ में मरुज विप्रों के परिवेषक होने का उल्लेख ) maru