मन्यु

In vedic etymology, word Manyu  has been mainly classified under the category of anger. But it’s exact nature has remained unclear. There is a statement that when soma degenerates from half – digested food, it gets converted into tiger. And this tiger destroys lower types of natures, but is not able to harm higher types of nature. Moreover, there is a statement that Manyu exists in testicles. These two statements taken together can unfold the nature of Manyu. We all know now from development in modern medical science that function of testicles is to produce testosterone harmone and also produce sperms. This production is controlled mainly by pituitary gland and hypothalamus part of brain. Testosterone is responsible for aggressive nature of man. If testicles are castrated, this aggressive nature gets controlled to a large extent. It is also possible to control this aggressiveness without castration. This is possible by changing the nature of half – digested food which is producing tiger out of Manyu force. All of us know that when we have eaten food, we tend to sleep. This is so because food in intestines consumes oxygen which in turn consume it from brain and thus brain gets sluggish. What is required is that somehow, this food should not be able to  consume oxygen or any other energy while in intestines. Only then one can prevent the generation of tiger out of Manyu.

प्रथम लेखन – १-१०-२०१० ई.(आश्विन् कृष्ण अष्टमी, विक्रम संवत् २०६७)

मन्यु

टिप्पणी – वैदिक निघण्टु में मन्यु शब्द का वर्गीकरण क्रोध नामानि तथा पद नामानि के अन्तर्गत किया गया है । यास्क निरुक्त १०.२९ के अनुसार –

मन्युर्मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः, क्रोधकर्मणो, वधकर्मणो वा, मन्यन्त्यस्मादिषवः । तस्यैषा भवति ।

इस सूत्र की आगे व्याख्या यास्क द्वारा त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणासोऽधृषता मरुत्वः इत्यादि के आधार पर की गई है । सूत्र के आरम्भ में मन्यु की व्याख्या मन्यते शब्द के आधार पर की गई है । वैदिक निघण्टु में मन्यते शब्द का वर्गीकरण अर्चतिकर्मा नामों के अन्तर्गत किया गया है ।  सूत्र के अन्तिम शब्दों के अनुसार मन्यु में से इषुओं का मन्यन होता है, इसलिए इसे मन्यु कहा जाता है । डा. गोपालकृष्ण एन. भट्ट के शोधग्रन्थ Vedic Nighantu पृष्ठ १६६ के अनुसार ऋग्वेद में मन्यु शब्द ५३ बार प्रकट हुआ है । इनमें से ४१ स्थानों पर इस शब्द की व्याख्या सायणाचार्य द्वारा वैदिक निघण्टु के अनुरूप ही क्रोध अर्थ में की गई है, दो स्थानों पर तेजस् रूप में तथा तीन स्थानों पर स्तोत्र रूप में । ऋग्वेद १०.८७.१३(मन्योर्मनसः शरव्या जायते या इति) की व्याख्या के लिए सायणाचार्य यास्क के निरुक्त में उपलब्ध व्याख्या का आश्रय लेते हैं । जिन तीन स्थानों पर सायण द्वारा मन्यु का भाष्य स्तोत्र के रूप में किया गया है, वहां यह प्रश्न उठता है कि सायण द्वारा स्तोत्र अर्थ करने का क्या आधार हो सकता है । मन्यु के अतिरिक्त वेद में एक शब्द आता है मन्यति, मन्यते आदि । मन्यु संज्ञा है जबकि मन्यते क्रिया । मन्यति शब्द का वर्गीकरण वैदिक निघण्टु में अर्चतिकर्मा के अन्तर्गत किया गया है । मन्यति का साधारण अर्थ होता है कि मैं ऐसा मानता हूं । लेकिन वैदिक निघण्टु चेतावनी देता है कि वेद का यह शब्द इतना साधारण अर्थों वाला नहीं है ।

यदि डा. फतहसिंह की विचारधारा के अनुसार सोचा जाए तो मन्यु शब्द मन – ऊ का योग हो सकता है । अथवा मन्यु शब्द का रूप मण्यु हो सकता है अर्थात्  कोई गुण जो मणि बनाने योग्य है । यदि मन्यु क्रोध का कोई रूप है तो उसे मणि किस प्रकार बनाया जा सकता है, यह विचारणीय है ।  अथर्ववेद ९.१२.१३(९.७.१३) का कथन है – क्रोधो वृक्कौ मन्युराण्डौ प्रजा शेपः । अर्थात् देह में क्रोध का तादात्म्य वृक्क – द्वय से है, मन्यु का अण्ड – द्वय से और प्रजा का शेप से ।  इसका अर्थ यह हो सकता है कि क्रोध का जन्म वृक्क – द्वय में होता है, मन्यु का अण्ड – द्वय में तथा प्रजा का शेप या शिश्न से । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में यह भली भांति ज्ञात है कि अण्ड – द्वय का हमारे शरीर में क्या योगदान है । अण्ड – द्वय से पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन नामक रस का स्रवण होता है जो पुरुष में कामभाव आदि उत्पन्न करता है । यही टेस्टोस्टेरोन नामक हारमोन पुरुष में मद जैसी कोई स्थिति उत्पन्न करता है । अण्ड – द्वय का दूसरा कार्य शुक्राणुओं को उत्पन्न करना है । जिन नर पशुओं के अण्ड – द्वय का छेदन कर दिया जाता है, वह अपेक्षाकृत अधिक सौम्य हो जाते हैं तथा उनका भार भी बढ जाता है । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में यह भी ज्ञात है कि अण्ड – द्वय स्वतन्त्र रूप से कार्य नहीं करते । उनका नियन्त्रण पीयूष ग्रन्थि pituitary gland तथा मस्तिष्क के हाइपोथेलमस भाग द्वारा होता है । तृतीय चक्षु का नियन्त्रण भी पीयूष ग्रन्थि से ही होता है । ब्रह्म पुराण में तो प्रत्यक्ष रूप से शिव के तृतीय चक्षु से मन्यु की उत्पत्ति कही गई है । ऋग्वेद ७.६१.१ द्वारा भी इसकी पुष्टि होती है –

उद्वां चक्षुर्वरुण सुप्रतीकं देवयोरेति सूर्यस्ततन्वान् । अभि यो विश्वा भुवनानि चष्टे स मन्युं मर्त्येष्वा चिकेत ।।

अर्थात् हे वरुण, तुम्हारा चक्षु सुप्रतीक है, देव स्थिति को प्राप्त होने पर सूर्य का रूप धारण कर लेता है जो सारे विश्व के भुवनों को देखता है । वह मर्त्यों में मन्यु का दर्शन करता है ।

प्रश्न यह उठता है कि नर के आक्रामक स्वभाव को प्रदान करने वाले टेस्टोस्टेरोन नामक हारमोन  को मण्यु अथवा मन्यु कैसे बनाया जा सकता है जिससे वह अभीष्ट कार्य की सिद्धि में सहायक हो सके ।   शतपथ ब्राह्मण   १२.७.१.८ के अनुसार इन्द्र द्वारा त्वष्टा के सोमयाग में अनुपहूत होकर सोमपान करने से वह सोम उसके विभिन्न अंगों से विभिन्न रूपों में स्रवित हुआ । उसके ऊवध्य से स्रवित सोम व्याघ्र बना जो आरण्यक पशुओं का राजा है । ऊवध्य पशु के आमाशय में स्थित अधपके भोजन को कहते हैं( लेकिन इस शब्द का कोई गहरा अर्थ भी हो सकता है) । शतपथ ब्राह्मण १०.६.४.१ में ऊवध्य के विराट रूप को सिकताः कहा गया है । सिकता शब्द में तेज जैसा कोई गुण छिपा है । यदि ऊवध्य आन्त्रों से ऊर्जा का हरण करने वाला है, जैसा कि सामान्य स्थिति है( भोजन के पश्चात् नींद आने लगती है । इसका कारण यह कहा जाता है कि भोजन आन्त्रों में से आक्सीजन का हरण कर लेता है और आन्त्र उस आक्सीजन का हरण मस्तिष्क से करती हैं जिससे मस्तिष्क थक जाता है और नींद आ जाती है ) तो उससे नियन्त्रित न हो सकने वाले किसी व्याघ्र जैसे आरण्यक गुण की ही उत्पत्ति हो सकती है । यदि हम ध्यान रखें कि ऊवध्य का सिकता गुण नष्ट न हो तो हमें अपने भोजन का चयन बहुत ध्यान रखकर करना होगा ।  जैसा कि व्याघ्र की टिप्पणी में कहा जा चुका है, व्याघ्र का कार्य तमस व रजस प्रकार की प्रकृतियों को नष्ट करना, उनका भक्षण करना होता है । लेकिन सात्विक प्रकृति का वह भक्षण नहीं कर सकता । सात्विक प्रकृति का साक्षात्कार करके तो मन्यु रूपी व्याघ्र का रूपान्तरण हो जाता है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.८.३.३ में सत्य मन्यु का उल्लेख आया है –

अयं शृण्वे अध जयन्नुत घ्नन् । अयमुत प्रकृणुते युधा गाः । यदा सत्यं कृणुते मन्युमिन्द्रः । विश्वं दृढं भयत एजदस्मात् ।।

यह सत्य मन्यु कौन सा हो सकता है, असत्य मन्यु कौन सा, यह स्पष्ट नहीं है । अनुमान लगाया जा सकता है कि जो मन्यु सात्विक प्रकृति को पहचान सके, उसका परिज्ञान कर सके, वही सत्य मन्यु है । उपमन्यु शब्द की टिप्पणी में उल्लेख किया जा चुका है कि उपमन्यु द्वारा शिव के दर्शन का हठ सत्य मन्यु के दर्शन करना हो सकता है ।

वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से मन्यु को शत्रुओं का नाश करने वाला कहा गया है । यह शत्रु तामसी और राजसी प्रकृतियां हो सकती हैं । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.४.१०.१ में मन्यवे या मन्यु युक्त के लिए अयःतापक का आलभन करने का निर्देश है । इसका अर्थ यह हुआ कि यदि मन्यु विद्यमान है तो उसका उपयोग अयः का, लोहे का तापन करने हेतु होना चाहिए, लौह स्तर का परिष्कार करने में होना चाहिए ।

तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.९.४ में पशुओं के मन्यु को वाराह की संज्ञा दी गई है । यह कहा जा सकता है कि मन्यु के कारण परिवर्तन यज्ञवराह के रूप में होगा जहां सब इन्द्रियां यज्ञ रूप धारण कर लेंगी । आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १८.१७.१२ में अग्निचिति पर आरोहण के पश्चात् वराह चर्म से बने उपानह का त्याग किया जाता है और उस समय कहा जाता है – पशूनां मन्युरसि। शतपथ ब्राह्मण ९.१.१.६ में शतरुद्रिय के संदर्भ में उल्लेख आता है कि सभी देवों ने प्रजापति का त्याग कर दिया लेकिन मन्यु देव ने उन्हें नहीं त्यागा । वह प्रजापति में प्रवेश करके स्थित हो गया । वह(प्रजापति) रोए। उनके जो अश्रु बहे, वह मन्यु में स्थित हो गए । वह शतशीर्षा रुद्र बने जिनका शमन   शतरुद्रिय कहलाता है । कर्मकाण्ड में शतरुद्रिय होम प्रसिद्ध है जबकि पुराणों में शतरुद्रिय के अन्तर्गत शिव के सौ विभिन्न रूपों की सौ प्रकार से अर्चना की जाती है (उदाहरण के लिए, स्कन्द पुराण १.२.१३) ।

साधारण तर्क से विचार करने पर मन्यु शब्द का एक अर्थ वह प्राण लिया जा सकता है जो मन में रूपान्तरित करने योग्य है, अथवा जिसके द्वारा प्राण में मन का प्रवेश कराया जा सकता है । प्राणों में मन का प्रवेश कराने से क्या उपलब्धि होगी, यह मन्यु सूक्त के ऋषि शीर्षक में सममिति में वृद्धि के रूप में स्पष्ट किया गया है। वैदिक साहित्य में कहा जाता है कि प्राण का बृहत् रूप सूर्य है और मन का बृहत् रूप चन्द्रमा । यह अन्वेषणीय है कि कौन – कौन से ऐसे प्राण हैं जहां मन का प्रवेश कराया जा सकता है । सोमयाग तो सारा प्राणों में सोम का प्रवेश कराने से ही सम्बन्धित है । अथर्ववेद २.१२.७ का मन्त्र निम्नलिखित है –

सप्त प्राणानष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा ।

अया यमस्य सादनमग्निदूतो अरंकृतः।।

अर्थात् सात प्राण हैं और आठ मन्य हैं । इन्हें मैं ब्रह्म द्वारा छिन्न करता हूं । मन्य का अर्थ सायण भाष्य में धमनि या कण्ठगत नाडीविशेष किया गया है । जब सात प्राणों का उल्लेख आता है तो उससे तात्पर्य शीर्ष के सबसे अधिक विकसित ७ प्राणों से लिया जाता है । अनुमान है कि जैसे – जैसे प्राण अपनी स्थूलता त्याग कर स्वर रूप होते जाएंगे, उनमें मन का प्रवेश संभव हो सकेगा ( प्राणा वै स्वराः – जैमिनीय ब्राह्मण)।

मन्यु व वशा गौ

पैप्पलाद संहिता १३.५.२२ में वशा गौ के संदर्भ में उल्लेख आता है –

वशायां मन्युर् अविशत् तं मन्युम् अविशद् वशा ।।

डा. फतहसिंह के अनुसार वशा प्रकृति वह होती है जो घटने – बढने, अंग्रेजी के waxing – waning गुण से रहित हो जाए, मुक्त हो जाए, जैसे चन्द्रमा को waxing – waning अर्थात् घटने – बढने वाला कहा जाता है । हमारे वक्ष में भी यही waxing – waning गुण विद्यमान है । मन्त्र का कहना है कि जहां waxing – waning समाप्त हो जाएंगे , तभी मन्यु का उस प्रकृति में प्रवेश हो सकेगा( साधारण रूप में वशा गौ वन्ध्या गौ को, जो वत्स को जन्म नहीं दे सकती, कहते हैं) । शतपथ ब्राह्मण ४.५.१.९ के अनुसार देवगण रेतः से विभिन्न प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करते हैं । जब रेतः में कोई रस शेष न रहा, उससे मैत्रावरुणी वशा उत्पन्न हुई । अनुमान लगाया जा सकता है कि यह रसहीन स्थिति निर्विकल्प समाधि की स्थिति हो सकती है । समाधि की ओर प्रस्थान और उससे व्युत्थान को waxing – waning कहा जा सकता है। एक वश है, एक वशा । जैमिनीय ब्राह्मण २.४०७ के अनुसार आत्मा अंगों को वश में कर सकती है । जब वश प्रकृति में स्रवित होता है, तब प्रकृति वशा बनती है । मैत्रायणी संहिता २.१३.१५ का कथन है –

वागसि जन्मना वशा, सा प्राणं गर्भमधत्थाः ।

इस कथन में अतिमानसिक वाक् को, अन्तरात्मा की आवाज को वाक् कहा जा रहा है । यदि वह वशा बन जाए तो प्राण को धारण कर सकती है । यह प्राण भी मन्यु का रूप हो सकता है।

 

मन्यु सूक्तों के ऋषि

ऋग्वेद १०.८३(यस्ते मन्यो इत्यादि) व १०.८४(त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो इति) सूक्तों का ऋषि मन्यु तापस है जबकि देवता मन्यु है । अथर्ववेद ४.३१ व ४.३२ में इन्हीं सूक्तों की पुनरावृत्ति हुई है लेकिन वहां ऋषि ब्रह्मा स्कन्दः हो गया है । अथर्ववेद में ऋषि के नाम में परिवर्तन कर देना हमें सूक्त की प्रकृति को समझने का अवसर देता है । ब्रह्मा का कार्य इस संसार में जहां – जहां भी सममिति में कमी है, उसको पूरा करना है । जैसे ब्रह्मा ने स्थावरों में विपर्यास के रूप में प्रवेश किया, तिर्यकों में शक्ति के रूप में, मनुष्यों में सिद्धि व बुद्धि के रूप में, देवों में पुष्टि के रूप में इत्यादि(ब्रह्माण्ड पुराण) । स्कन्द का कार्य पुराणों में एक तो तारकासुर का वध करना है । तारक असुर का अर्थ है कि संसार में जिस वस्तु का जो सत्य रूप – स्वभाव है, वैसा हमें दिखाई नहीं देता, अपितु हमें चित्र – विचित्र रूप के ही दर्शन होते हैं । अतः सत्य स्वभाव का दर्शन करना तारकासुर का वध करना है । वैदिक साहित्य में स्कन्द शब्द का अर्थ स्कन्न शब्द के द्वारा समझा जा सकता है  – जैसे ब्रह्मा का वीर्य निकल पृथिवी पर बिखर गया । यह बिखरना वही सममिति को पूरा करना हो सकता है । सूक्तों की ऋचाओं का अर्थ अन्वेषणीय है ।

उपमन्यु व दुग्ध

पुराणों में उपमन्यु की सार्वत्रिक कथा आती है कि बालक उपमन्यु को गाय का दुग्ध उपलब्ध नहीं था । उसने कहीं पर उसका आस्वादन कर लिया तो उसकी माता ने कहा कि अरण्य में उनके पास गौ दुग्ध प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है । लेकिन यदि वह चाहे तो साम्ब सदाशिव की आराधना करके उनसे सत्य दुग्ध प्राप्त कर सकता है । उपमन्यु शिव की आराधना करता है और अन्त में शिव व पार्वती उसे कुमारत्व प्रदान करते हैं जिससे वह क्षीर के पहाडों की प्राप्ति करता है। महाभारत में एक कथा आती है कि जमदग्नि ऋषि ने पितरों के हेतु पयःनिर्वाप किया । धर्म ने परीक्षा लेने हेतु पयः में क्रोध रूप में प्रवेश किया जिससे वह पयः दूषित हो गया । तब पितरों ने धर्म को शाप दे दिया कि तुम नकुल हो जाओ और तुम्हारा उद्धार तभी होगा जब तुम युधिष्ठिर पर आक्षेप करोगे । उसी नकुल ने अश्वमेध के पश्चात् युधिष्ठिर की सभा में आकर आक्षेप किया कि उनके अश्वमेध मे इतनी शक्ति नहीं है कि उसका शेष आधा भाग हिरण्मय हो जाए । इस कथा में ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जहां भी तनाव विद्यमान होगा, क्रोध विद्यमान होगा, वहां पयः दूषित हो ही जाएगा ( यह पता नहीं है कि क्रोध के बदले काम का नाम क्यों नहीं लिया गया )। पयः एकदम तनाव से मुक्त अवस्था है । नकुल का अर्थ होता है जो कुल से, कार्य – कारण शृङ्खला की जकडन से मुक्त है । जहां किसी घटना के पीछे कारण का पता होता है, वहां क्रोध नहीं आता । वहां करुणा ही उत्पन्न होती है ।  सायणाचार्य द्वारा कुछेक ऋचाओं में मन्यु का भाष्य स्तोत्र किया गया है । स्तोत्र को तनाव से मुक्त अवस्था कहा जा सकता है । अतः इस दृष्टिकोण से सायण का भाष्य अद्वितीय है । उपमन्यु शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है ।

मन्यु द्वारा कर्षण

ऋग्वेद ८.६.४ की ऋचा निम्नलिखित है –

समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ।।

यही ऋचा अथर्ववेद २०.१०७.१ में प्रकट हुई है तथा इस ऋचा पर सामवेद में दो सामों १३७ व १६५१ की रचना की गई है जिससे इसके महत्त्व का अनुमान लगाया जा सकता है । इस ऋचा के अनुसार मन्यु युक्त मनुष्य के लिए उसकी सारी कृष्टयः अर्थात् इन्द्रियां या उसके विचार, इच्छा आदि प्रजाएं नमन वैसे ही करती हैं जैसे सिन्धु समुद्र में नमन करते हैं । इसका अर्थ यह है कि जो मन्यु से युक्त है, वह अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करने में समर्थ हो सकता है, अन्यथा इन्द्रियों का दरवाजा तो केवल बाहर की ओर ही खुलता है । डा. फतहसिंह ईसाई धर्मावलम्बियों के पैगम्बर क्राइस्ट की व्याख्या वेद के कृष्टि शब्द से ही करते हैं । पुराणों में कृष्ण पुत्र प्राप्ति हेतु उपमन्यु से दीक्षा लेते हैं और साम्ब सदाशिव की आराधना से साम्ब नामक पुत्र प्राप्त करते हैं । इस कथा में कृष्ण को भी कर्षण करने में समर्थ के रूप में समझा जा सकता है जो मन्यु का आश्रय लेकर साम्ब की प्राप्ति करता है । साम्ब नामक ज्योति की स्थिति हृदय में कही जाती है ।

मन्यु और इन्द्र जन्म

ऋग्वेद ४.१७.२ के अनुसार जब इन्द्र का जन्म होता तो उसके त्वेष से द्युलोक का कम्पन होता है जबकि मन्यु से भूमि का –

तव त्विषो जनिमन् रेजत द्यौ रेजद् भूमिर्भियसा स्वस्य मन्योः ।

ऋग्वेद १०.७३.१० के अनुसार –

अश्वादियायेति यद्वदन्त्योजसो जातमुत मन्य एनम् ।

मन्योरियाय हर्म्येषु तस्थौ यतः प्रजज्ञ इन्द्रो अस्य वेद ।।

इस मन्त्र की व्याख्या जैमिनीय ब्राह्मण ३.३६५ में भी की गई है । इस ऋचा के सायण भाष्य तथा जैमिनीय ब्राह्मण में कहा गया है कि इस मन्त्र के ऋषि गौरिवीति शाक्त्य से पूछा गया कि इन्द्र की उत्पत्ति कहां से होती है । ऋषि ने उत्तर दिया कि ऐसा कहते हैं कि उसका उदय अश्व से होता है । लेकिन मेरा मानना है कि उसका उदय ओज से होता है । मन्यु से जब उसका उदय होता है तब वह हर्म्यों में आसीन हो जाता है । वहां से उसका जन्म कैसे होता है, यह पता नहीं है, इन्द्र स्वयं ही यह जानता होगा । जैमिनीय ब्राह्मण में इससे आगे वर्णन आता है कि इन्द्र ने पूछा कि अब मैं कहां जन्म लूं, यह सब तो मेरे द्वारा व्याप्त है। ऋषि ने उसे वसन्त ऋतु के दो मास दिए । इन्द्र ने उनमें से रथन्तर भा का ग्रहण कर लिया । उसमें पुनः प्रवेश कर गया । इसी प्रकार अन्य मासों में । यह वैसे ही है जैसे यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः । एक यज्ञ से दूसरे श्रेष्ठ यज्ञ का जन्म हो रहा है ।

 

केवल ऋग्वेद ४.३१.६ में ही मन्यु शब्द बहुवचन रूप में प्रकट हुआ है –

सं यत्त इन्द्र मन्यवः सं चक्राणि दधन्विरे । अध त्वे अध सूर्ये ।।

लगता है कि इस ऋचा में मन्युओं की तुलना चक्रों से की गई है ।

मन्यु और धनुष –

अथर्ववेद ६.४२.१ के मन्यु सूक्त का प्रथम मन्त्र है –

अव ज्यामिव धन्वनो मन्युं तनोमि ते हृदः ।

यथा संमनसो भूत्वा सखायाविव सचावहै ।।

अर्थात् मैं तेरे हृदय से मन्यु का अवतनन इस प्रकार करता हूं जैसे धनुष पर से ज्या का अवरोपण किया जाता है । ऐसा करने से हम दोनों एक मन हो सकेंगे और सखाओं की भांति व्यवहार कर सकेंगे । इस मन्त्र से संकेत मिलता है कि हृदय में स्थित प्राण उन प्राणों में से हैं जिन पर मन का आरोपण करके, उन्हें मन द्वारा सममिति प्रदान करके मन्यु बनाया जा सकता है । लेकिन इस मन्यु को भी हटाना है । अथर्ववेद ५.१८.८ का मन्त्र है –

जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः।

तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृद्बलैर्धनुभिर्देवजूतैः।।

इस मन्त्र के स्वामी गंगेश्वरानन्द कृत भाष्य में कहा गया है कि ब्रह्मा देवपीयुओं अर्थात् देवों को हानि पहुंचाने वालों का वेधन इस प्रकार करता है कि हृद्बल उसके धनुष बन जाते हैं, जिह्वा ज्या बन जाती है, वाक् कुल्मल अर्थात् धनुर्दण्ड बन जाती है, दन्त नालीक नामक आयुध बन जाते हैं । इस मन्त्र से संकेत मिलता है कि जब हृदय धनुष हो तो जिह्वा उसकी ज्या हो सकती है । पैप्पलाद संहिता १.९२.४ में जिह्वाग्र पर स्थित किसी मन्यु का उल्लेख है –

जिह्वाया अग्रे यो वो मन्युस् तं वो वि नयामसि ।।

जिह्वाग्र पर रसों का आस्वादन करने वाले तन्तु विद्यमान होते हैं । शिश्नाग्र और जिह्वाग्र का परस्पर सम्बन्ध कहा जाता है । और तो और, जिस टेस्टोस्टेरोन का ऊपर उल्लेख किया गया है, चिकित्सा साहित्य में कहा गया है कि उसके कारण अतिरिक्त जिह्वाग्र तन्तुओं का विकास भी किया जा सकता है । इसका यह तात्पर्य भी हो सकता है कि जब किसी रुग्णता के कारण मुख का स्वाद खराब हो जाता है, उसमें भी यही हारमोन उत्तरदायी हो सकता है ।

धनुष और उसकी ज्या के इन उल्लेखों को तब समझा जा सकता है जब यह ज्ञान हो कि अध्यात्म में धनुष और उसकी ज्या से क्या तात्पर्य हो सकता है । जब कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर ऊर्ध्वमुखी हो जाती है, उस समय की कुण्डलिनी की अवस्था को ज्या और शरीर को धनुष का नाम दिया जा सकता है । ज्या को गुण भी कहते हैं । अतः जब धनुष ज्यारहित होता है तो उसका अर्थ होगा कि वह सत्, रज व तम नामक तीन गुणों से रहित अवस्था में है ।  महाभारत सौप्तिक पर्व १८.७ में यज्ञों को धनुष और वषट्कार को उसकी ज्या कहा गया है । वषट्कार को इस प्रकार समझ सकते हैं कि सोमयाग में सोम की आहुति प्रायः जोर से वौ3षट् का उच्चारण करने के पश्चात् दी जाती है, वैसे ही जैसे साधारण रूप से आहुति देते समय स्वाहा शब्द का उच्चारण किया जाता है । कहा गया है कि वौषट् के उच्चारण से आकाश में जो मेघ वर्षा के लिए तैयार रहते हैं, वह बरस पडते हैं । मेघों के संप्लावन, विद्युत का चमकना आदि कार्य अन्य शब्दों द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं । वौषट् का उच्चारण पूरा जोर लगाकर किया जाता है । इसे एक अभिचार समझा जाता है जो शत्रुओं का नाश करता है । वौषट् की दूसरी निरुक्ति इस प्रकार की गई है कि सूर्य वौ है और छह ऋतुएं षट् हैं । इस प्रकार वौषट् का उच्चारण करके पृथिवी पर ऋतुओं में सूर्य की प्रतिष्ठा की जाती है । वौषट् को मन्यु की स्थिति ही माना जा सकता है । अन्तर इतना है कि मन्यु की स्थिति प्राण में मन की प्रतिष्ठा होनी चाहिए, लेकिन वौषट् में सूर्य रूपी प्राण की प्रतिष्ठा ऋतुओं में की जा रही है । वौषट् से हम यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि मनुष्य में टेस्टोस्टेरोन की पराकाष्ठा क्या हो सकती है ।

धनुष और उसकी ज्या का एक स्वरूप नाग रूप में भी है । लेकिन मन्यु के इस रूप में विष विद्यमान रहेगा जिससे मुक्ति अपेक्षित है ।

अथर्ववेद ५.१३.६ का मन्त्र है –

असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च ।

सत्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वना वि मुञ्चामि रथाँ इव ।।

इस मन्त्र में कहा जा रहा है कि मैं असित आदि विभिन्न सर्पों के मन्युओं से तुझे वैसे ही मुक्त करता हूं जैसे धनुष से ज्या का मोचन किया जाता है अथवा जैसे रथों से अश्वों को अलग किया जाता है ।

अथर्ववेद ८.३.१२ तथा १०.५.४८ के मन्त्रों का दूसरा पद निम्नलिखित है –

मन्योर्मनसः शरव्या जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान् ।।

अर्थात् मन्यु युक्त मन से जो शरव्या या शर उत्पन्न होता है, उससे यातुधानों के हृदय का वेधन करो । इस प्रकार मन्यु के इन मन्त्रों में किसी न किसी प्रकार से हृदय का उल्लेख आ रहा है । यह भी स्पष्ट हो रहा है कि जहां मन्यु विद्यमान होगा, वहां वह धनुष की ज्या की भांति काम करेगा । यदि देह में स्थित मन्यु की बात करें तो वह प्रत्येक तन्तु में तनाव उत्पन्न करके उसको धनुष का स्वरूप देगा । अतः यह अपेक्षित है कि जहां जहां भी दूषित मन्यु के कारण धनुष बना हुआ है, उसे दूर करके सत्य मन्यु की, स्तोत्र की प्रतिष्ठा की जाए ।

दर्भ और मन्यु –

अथर्ववेद ६.४३ सूक्त दर्भ मणि का है जिसके प्रथम दो मन्त्र निम्नलिखित हैं –

अयं दर्भो विमन्युकः स्वाय चारणाय च। मन्योर्विमन्युकस्यायं मन्युशमन उच्यते।।

अयं यो भूरिमूलः समुद्रमवतिष्ठति । दर्भः पृथिव्या उत्थितो मन्युशमन उच्यते ।।

इन मन्त्रों में कहा जा रहा है कि जो यह दर्भ है, यह मन्यु से मुक्ति दिलाने वाला है । जिस दर्भ की समुद्र में बहुत सी मूल या जडें रहती हैं, वह जब पृथिवी से ऊपर उठता है तो मन्युशमन कहलाता है। लेकिन जब तक दर्भ का विकास ऊर्ध्व दिशा में नहीं होता, तब तक मन्यु का शमन नहीं हो सकता(यहां यह उल्लेखनीय है कि मन्यु सूक्त में मन्यु के दक्षिणतः स्थित होने की कामना की गई है(अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मे ऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि – ऋ. १०.८३.७) । उपमन्यु शब्द की टिप्पणी में यह उल्लेख किया जा चुका है कि एक वेद मन्त्र में उपमन्यु के लिए उद्भिद् विशेषण का प्रयोग हुआ है । अतः दर्भ और उपमन्यु तुलनीय हैं। दर्भ क्या होता है, इस संदर्भ में अथर्ववेद १९.३०.५ को उद्धृत किया जा सकता है –

यत् समुद्रो अभ्यक्रन्दत् पर्जन्यो विद्युता सह । ततो हिरण्ययो बिन्दुस्ततो दर्भो अजायत।।

अर्थात् जब समुद्र अभिक्रन्दन करता है, पर्जन्य के साथ विद्युत भी होती है, तब हिरण्यय बिन्दु की वृष्टि होती है जिससे दर्भ का जन्म होता है । इस मन्त्र से संकेत मिलता है कि दर्भ की उत्पत्ति में वृष्टि प्रक्रिया निहित है और वृष्टि प्रक्रिया में स्तनयन, विद्युत आदि निहित हैं । यह सब तीव्र गति से चालित होने वाली प्रक्रियाएं हैं । ऊपर मन्त्र का कहना है कि इससे मन्यु का शमन हो जाता है । इससे संकेत मिलता है कि मन्यु कोई धीमी गति से सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है जिसका शमन करने के लिए तीव्र गति वाली किसी प्रक्रिया की आवश्यकता है । ।

मन्यु के विशिष्ट कार्य

वैदिक ऋचाओं में मन्यु को विभिन्न देवताओं पर आरोपित किया गया है –

मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः। मन्युर्विश ईडते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः ।। – अथर्ववेद ४.३२.२

अथर्ववेद १.१०.२ के अनुसार –

नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि द्रुग्धम् । सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तवायम् ।।

अथर्ववेद ६.११६.३ में पितरों के मन्यु का उल्लेख है –

यावन्तो अस्मान् पितरः सचन्ते तेषां सर्वेषां शिवो अस्तु मन्युः।।

ऋग्वेद १.१३९.२ में मित्रावरुणौ द्वारा मन्यु की सहायता से ऋत से अनृत को पृथक् करने का उल्लेख है –

यद्ध त्यन्मित्रावरुणावृतादध्याददाथे अनृतं स्वेन मन्युना दक्षस्य स्वेन मन्युना ।

मन्यु व श्रावणी पर्व

मन्यु का उपरोक्त विवेचन यह समझने में सहायक हो सकता है कि क्यों श्रावणी पूर्णिमा को प्रातःकाल उठकर कामो अकार्षीत् मन्यु अकार्षीत् इत्यादि का हजार बार जप किया जाता है (महानारायणोपनिद)। काम और मन्यु का परस्पर सम्बन्ध क्या हो सकता है, इस संदर्भ में अथर्ववेद ९.२.२३ को उद्धृत किया जा सकता है –

ज्यायान् निमिषतोऽसि तिष्ठतो ज्यायान्त्समुद्रादसि काम मन्यो । ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि ।।

इस मन्त्र में कहा जा रहा है कि हे काम मन्यु, तुम निमेष से अधिक हो, तिष्ठ स्थिति वालों से अधिक हो । केवल यही एक ऐसा मन्त्र है जहां काम और मन्यु का उल्लेख एक साथ आया है । काम का अर्थ होता है कि कोई भी कामना उत्पन्न हुई, उसकी पूर्ति कल्पवृक्ष की भांति हो जानी चाहिए । अथर्ववेद ११.८.१ का मन्त्र निम्नलिखित है –

यन्मन्युर्जायामावहत्संकल्पस्य गृहादधि। क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरोऽभवत् ।।

आगे के मन्त्रों में इन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं । मन्यु जिस जाया का संकल्प के घर से वहन कर रहा है, उसका नाम आकूति बताया गया है । तप, कर्म जन्य और वर हैं जबकि ब्रह्म को ज्येष्ठवर कहा गया है । प्रस्तुत मन्त्र में संकल्प का उल्लेख है। लोकभाषा में संकल्प वह कामना होती है जिसको पूरा करने के लिए दृढ निश्चय करना पडता है । मन्त्र का कहना है कि ऐसी स्थिति में मन्यु कार्य करता है । वह जाया को, प्रकृति को इसके लिए तैयार करता है । आकूति क्या हो सकती है, इसके लिए आकूति शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है । डा. फतहसिंह के अनुसार आ – अर्थात् चारों ओर से, कू- शब्दे, अभिव्यक्त करना । चारों तरफ जिसका शब्द एक साथ होने लगे, बाढ की तरह, वह आकूति है ।

मन्यु पर श्री सुबोध कुमार के विचार –

मन्यु का अर्थ  दुष्टों पर क्रोध है. इसी लिए यजुर्वेद 19.9 में प्रार्थना है . परंतु वेदों में  मन्यु की कर्म भूमि  बडी विस्तृत  दीखती है. मानव कल्याण और समाज हित  के  मार्ग में अवरोधों को दूर  करने अथवा विकल्प के प्रयास मन्यु के ही के  कार्य क्षेत्र दीखते हैं . इस लिए मन्यु को  इंद्र के प्रेरक के रूप  में भी देखा जाता है.

महर्षि दयानंद ने मन्यु को बोध जन्य क्रोध बताया है. इस प्रकार  गीता में कृष्ण  का अर्जुन को सारा उपदेश अर्जुन में मन्यु जागृत करने पर नही  था.

सुबोध कुमार

 Manyu in Vedas

       मन्यु: वेदों मे RV 10/83 same as AV4.32, RV 10/84 same as AV4.31, AV6.41, AV6.42, AV6.43, AV 6.76

Self motivation/ Fire in the belly मन्यु

AV6-76, AV6-41,  RV 10-84,RV 10-83

 

             मन्यु का महत्व  

मन्यु का अर्थ  दुष्टों पर क्रोध है. इसी लिए यजुर्वेद 19.9 में प्रार्थना है .

मन्युरसि मन्युं मयि धेहि, हे दुष्टों पर क्रोध करने वाले (परमेश्वर) ! आप दुष्ट कामों और दुष्ट जीवो पर क्रोध करने का स्वभाव मुझ में  भी  रखिये.

भारत वर्ष  में महाभारत के पश्चात ऐसा लगता है कि समाज मन्यु  विहीन हो गया.  तभी तो हम सब दुष्टों के व्यवहार को परास्त न कर के , उन से समझौता करते चले  आ रहे  हैं . समाज राष्ट्र संस्कृति की सुरक्षा के लिए, मन्यु कितना मह्त्व का  विषय है यह इस बात से सिद्ध होता है कि ऋग्वेद मे पूरे दो सूक्त केवल मन्यु पर हैं. और इन्हीं दोनो सूक्तों का अथर्व वेद मे पुनः उपदेश मिलता है.

 अग्निरिव मन्यो तविषितः, विद्मा तमुत्सं आबभूथ, मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः वेद यह भी निर्देश देते हैं कि मन्यु एक दीप्ति है जिस का प्रकाश यज्ञाग्नि द्वारा मानव हृदय में होता है. हृदय के रक्त के संचार मे मन्यु का उत्पन्न होना बताते है. मन्यु यज्ञाग्नि से ही उत्पन्न जातवेदस सर्वव्यापक वरुण रूप धारण करता है.

परन्तु वेदों मे इस बात की भी सम्भावना दिखायी है,कि कभी कभी समाज में , परिवार में विभ्रान्तियों, ग़लतफहमियों, मिथ्याप्रचार के कारण भी सामाजिक सौहार्द्र में आक्रोश हो सकता है. ऐसी परिस्थितियों में आपस में वार्ता, समझदारी से आपसी मनमुटाव का निवारण कर, प्रेम भाव सौहर्द्र पुनः स्थापित किया जाना चाहिये.

 Rig Veda Book 10 Hymn 83 same as AV 4.32

 

यस्ते मन्योSविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक |
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता || ऋ10/83/1 

(वज्र सायक मन्यो)  Confidence is  born out of  being competently equipped and trained to perform a job.

हे मन्यु, जिस ने तेरा आश्रयण किया है, वह अपने शस्त्र सामर्थ्य को, समस्त बल और पराक्रम को निरन्तर पुष्ट करता है.साहस से उत्पन्न हुवे बल और परमेश्वर के साहस रूपि सहयोग से समाज का अहित करने वालों पर  बिना मोह माया ( स्वार्थ, दुख) के यथा योग्य कर्तव्य करता  है.


मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः |
मन्युं विश ईळते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः || ऋ10/83/2

मन्युदेव इंद्र जैसा सम्राट है. मन्युदेव ज्ञानी सब ओर से प्रचेत ,सचेत तथा धनी वरुण जैसे गुण वाला है  .वही यज्ञाग्नि द्वारा समस्त वातावरण और समाज मे कल्याण कारी तप के उत्साह से सारी मानव प्रजा का सहयोग प्राप्त करने मे समर्थ होता है. (सैनिकों और अधिकारियों के मनों में यदि मन्यु की उग्रता न हो तो युद्ध में सफलता नहीं हो सकती. इस प्रकार युद्ध में  मन्यु ही पालक तथा रक्षक होता है.)


अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान् तपसा युजा वि जहि शत्रून् |
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः || ऋ10/83/3

हे वज्ररूप, शत्रुओं के लिए अन्तकारिन्‌ , परास्त करने की शक्ति के साथ उत्पन्न होने वाले, बोध युक्त क्रोध ! अपने कर्म के साथ प्रजा को स्नेह दे कर अनेक सैनिकों के बल द्वारा समाज को महाधन उपलब्ध करा.

त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः सवयंभूर्भामो अभिमातिषाहः |
विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि || ऋ10/83/4 

हे बोधयुक्त क्रोध मन्यु!  सब को परास्त कारी ओज वाला, स्वयं सत्ता वाला, अभिमानियों का  पराभव  करने वाला , तू विश्व का शीर्ष नेता है. शत्रुओं के आक्रमण को जीतने वाला विजयवान है. प्रजाजनों, अधिकारियों, सेना में अपना ओज स्थापित कर.

अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्यप्रचेतः |
तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि ||ऋ10/83/5 

हे त्रिकाल दर्शी मन्यु, तेरे वृद्धिकारक  कर्माचरण से विमुख हो कर मैने तेरा निरादर किया है ,मैं पराजित  हुवा हूँ. हमें अपना बल तथा ओज शाली स्वरूप दिला.

अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ्  प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः |
मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूंरुत बोध्यापेः || ऋ10/83/6

हे प्रभावकारी समग्र शक्ति प्रदान करने वाले मन्यु, हम तेरे अपने हैंबंधु अपने आयुध और बल के साथ हमारे पास लौट कर आ, जिस से हम तुम्हारे सहयोग से सब अहित करने वाले शत्रुओं पर सदैव विजय पाएं.


अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मे Sधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि |
जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव ||ऋ10/83/7

हे मन्यु , मैं तेरे श्रेष्ठ भाग और पोषक, मधुररस की स्तुति करता हूं . हम दोनो युद्धारम्भ से पूर्व अप्रकट मंत्रणा करें ( जिस से हमारे शत्रु को हमारी योजना की पूर्व जानकारी न हो). हमारा दाहिना हाथ बन, जिस से हम राष्ट्र  का आवरण करने वाले शत्रुओं पर विजय पाएं.

***************************************************************************

 

 Rig Veda Book 10 Hymn 84 same as AV 4.31

त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणासो धृषिता मरुत्वः |
तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः || ऋ10/84/1 अथव 4.31.1

 

हे  मरने  की अवस्था में भी उठने की प्रेरणा देने  वाले  मन्यु , उत्साहतेरी सहायता से रथ सहित शत्रु को विनष्ट करते हुए और स्वयं आनन्दित  और प्रसन्न चित्त हो कर  हमें उपयुक्त शस्त्रास्त्रों से अग्नि के समान तेजस्वी नेत्रित्व  प्राप्त हो.


अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि |
हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व ||ऋ10/84/2 अथर्व 4.31.2

हे उत्साह रूपि मन्यु तू अग्नि का तेज धारण कर, हमें समर्थ बना. घोष और  वाणी से आह्वान  करता हुवा  हमारी सेना  को नेत्रित्व प्रदान करने वाला हो. अपने शस्त्र बल को नापते  हुए  शत्रुओं को परास्त कर के हटा दें.


सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे रुजन् मृणन् प्रमृन् प्रेहि शत्रून् |
उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयस एकज त्वम् || ऋ10/84/3अथर्व 4.31.3

 

अभिमान करने वाले शत्रुओं को नष्ट करने का तुम अद्वितीय  सामर्थ्य रखते हो.


एको बहूनामसि मन्यवीळितो विशं-विशं युधये सं शिशाधि |
अकृत्तरुक त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्महे || ऋ10/84/4अथर्व 4.31.4

हे मन्यु बोधयुक्त क्रोध अकेले तुम ही सब सेनाओं और प्रजा जनों का उत्साह बढाने वाले हो. जयघोष और सिन्ह्नाद सेना और प्रजा के पशिक्षण में  दीप्ति का प्रकाश करते हैं वह  तुन्हारा ही प्रदान किया हुवा है.


विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवो Sस्माकं मन्यो अधिपा भवेह |
प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं यत आबभूथ ||  ऋ10/84/5अथत्व 4.31.5

 

मन्यु द्वारा विजय कभी निंदनीय नहीं होती. हम उस प्रिय मन्यु के उत्पादक  रक्त के संचार करने वाले हृदय  के बारे में भी जानकारी प्राप्त करें.

आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्ष्यभिभूत उत्तरम |
क्रत्वा नो मन्यो सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूतसंसृजि ||ऋ10/84/6  अथर्व 4.31.6

दिव्य सामर्थ्य उत्पन्न कर के उत्कृष्ट बलशाली मन्यु अपनी सम्पूर्ण शक्ति से अनेक स्थानों पर पुकारे जाने पर उपस्थित हो कर, हमे  महान ऐश्वर्य युद्ध मे  विजय प्रदान करवाये.
संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः |
भियं दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम् || ऋ10/84/7  AV4.31.7

हे मन्यु ,  बोधयुक्त क्रोध , समाज के शत्रुओं द्वारा (चोरी से) प्राप्त प्रजा के धन को तथा उन शत्रुओं  के द्वारा राष्ट्र से पूर्वतः एकत्रित किये  गये  दोनो प्रकार के धन को शत्रु के साथ युद्ध में जीत कर सब प्रजाजनों अधिकारियों को प्रदान कर (बांट). पराजित शत्रुओं के हृदय में इतना भय उत्पन्न कर दे कि वे निलीन हो जाएं.

( क्या यह स्विस बेंकों मे राष्ट्र के धन के बारे में उपदेश नहीं है)

 

(********************************************************************

 

Atharva 6/41

मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये !

मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम् !! अथर्व 6/41/1

(मनसे) सुख दु:ख आदि को प्रत्यक्ष कराने वाले मन के लिए (चेतसे) ज्ञान साधन चेतना के लिए (धिये) ध्यान साधन बुद्धिके लिए (आकूतये) संकल्प  के लिए (मत्यै) स्मृति साधन मति के लिए, (श्रुताय) वेद ज्ञान के लिए ( चक्षसे) दृष्टि शक्ति के लिए (वयम) हम लोग (हविषा विधेम) अग्नि मे हवि द्वारा यज्ञ करते हैं.

भावार्थ: यज्ञाग्नि के द्वारा उपासना से मनुष्य को सुमति, वेद ज्ञान,चैतन्य, शुभ संकल्प, जैसी उपलब्धियां होती हैं जिन की सहायता से जीवन सफल हो कर सदैव सुखमय बना रहता है.

  

अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे !

सरस्वत्या उरुवव्यचे विधेम हविषा वयम !! अथर्व 6/41/2

(अपानाय व्यानाय) शरीरस्थ प्राण वायु के लिए (भूरिधायसे)अनेक प्रकार से धारण करने वाले (प्राणाय) प्राणों के लिए (उरुव्यचे) विस्तृत गुणवान सत्कार युक्त (सरस्वत्यै) उत्तम ज्ञान की वृद्धि के लिए (वयम हविषा विधेम) हम अग्नि मे हवि द्वारा द्वारा होम करते हैं.

भावार्थ: प्राणापानादि शरीरस्थ प्राण वायु के विभिन्न व्यापार मानव शरीर को सुस्थिर रखते हैं. इन्हें कार्य क्षेम रखने के लिए युक्ताहार विहार के साथ प्राणायामादि के साथ यज्ञादि संध्योपासना प्राणों को ओजस्वी बनाने के सफल साधन बनते हैं

 

मा नो हासिषुरृषयो दैव्या ये तनूपा ये न तन्वस्व्तनूजा: !

अमर्त्या मर्तयां अभि न: सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे न: !! अथर्व 6/41/3

(ये) जो (दैव्या ऋषिय:) यह दिव्य सप्तऋषि(तनूपा) शरीर की रक्षा करने वाले हैं (ये न: तन्व: तनूजा) ये जो शरीर में इंद्रिय रूप में स्थापित हैं वे (न: मा हासिषु) हमें मत छोडें .(अमर्त्या:) अविनाशी देवगण (मर्त्यान् न) हम मरण्धर्मा लोगों को (अभिसचध्वं) अनुगृहीत करो, (न: प्रतरं आयु:) हमारी  दीर्घायु  को (जीवसेधत्त) जीवन के लिय समर्थ करें( इसी संदर्भ में “ शुक्रमुच्चरित ” द्वारा ऊर्ध्वरेता का भी महत्व बनता है  शरीरस्थ सप्तृषि: सात प्राण, दो कान (गौतम और भरद्वाज ज्ञान को भली भांति धारण करने से भरद्वाज) दो चक्षु (विश्वामित्र और जमदग्नि जिस से ज्योति चमकती है) दो नासिका (वसिष्ठ और कश्यप प्राण के संचार का मार्ग), और मुख (अत्रि:)

 Resolve Misperceptions – भ्रांति निवारण

 Negotiations

अव ज्यामिव धन्वनो मन्युं तनोमि ते हृदः!

यथा संमनसौ भूत्वा सखायाविव सचावहै !! अथर्व 6.42.1

असह्य व्यवस्था के विवेकपूर्ण  चिन्तन  करने से ज्ञान दीप्ति द्वारा मित्रों की तरह सुसंगत होने का भी प्रयास करना चाहिए.

Possible misapprehensions leading to public unrest /family discords should be resolved by better understanding. Angry situations may thus be resolved to establish peace and harmony.

Bury the hatchet- शांति वार्ता

सखायाविव सचावहा अव मन्युं तनोमि ते !

अघस्ते अश्मनो मन्युमुपास्यामसि यो गुरुः !! अथर्व 6.42.2

परिवार में समाज में विभ्रान्ति

Anger caused by misunderstandings should be resolved to establish friendly atmosphere. Anger should be forgotten as if buried under a heavy stone.

 

Restore Amity-सौहार्द्र पुनः स्थापन

 

अभि तिष्ठामि ते मन्युं पार्ष्ण्या प्रपदेन च !

यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि !! अथर्व 6.42.3

Public Anger should be forgotten for the hearts to become one. This is as if the anger had been crushed under the heels.

 

यज्ञाग्नि का हृदय में स्थापित्य से क्षत्रियत्व का प्रभाव

अथर्व 6.76

1.य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे ! संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु  हृदयादधि अथर्व 6.76.1

जो इस  यज्ञाग्नि के चारों ओर बैठते हैं , इस की उपासना करते हैं, और दिव्य दृष्टि के लिए इस का आधान करते हैं , उन के हृदय के ऊपर प्रदीप्त हुवा अग्नि अपनी ज्वालाओं से उदय हो कर क्षत्रिय गुण प्रेरित करता है.

2.अग्नेः सांत्पनस्याहमायुषे पदमा रभे ! अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः !!अथर्व 6.76.2

शत्रु को तपाने  वाली अग्नि के (पदम्‌) पैर को, चरण को  (आयुषे) स्वयं की, प्रजाजन की, राष्ट्र की दीर्घायु के लिए (अह्म्‌) मैं ग्रहण करता हूँ . इस अग्नि के धुंए को मेरे मुख से उठता हुवा सत्यान्वेषी मेधावी पुरुष देख पाता है.

 

3.यो अस्य समिधं वेद क्षत्रियेण समाहिताम्‌ ! नाभ्ह्वारे पदं नि दधाति स मृत्यवे !! अथर्व 6.76.3

जो प्रजाजन इस धर्मयुद्ध की  अग्नि को देख पाता है, जो क्षत्रिय धर्म सम्यक यज्ञाग्नि सब के लिए समान रूप से आधान की जाती है. उसे समझ कर प्रजाजन कुटिल छल कपट की नीति को त्याग कर मृत्यु के लिए पदन्यास नहीं करता.

  1. नैनं घ्नन्ति पर्यायिणो न सन्नाँ अव गच्छति! अग्नेर्यः क्ष्त्रियो विद्वान्नम गृह्णात्यायुषे !! अथर्व 6.76.4

जो सब ओर से घेरने वाले शत्रु हैं वह इस आत्माग्नि  का सामना नहीं  कर पाते, और समीप रहने वाले भी इस को जानने में असमर्थ रहते हैं. परन्तु जो ज्ञानी क्षत्रिय   धर्म ग्रहण करते हैं वे हुतात्मा अमर हो जाते हैं .

Subodh Kumar,
C-61 Ramprasth,
Ghaziabad-201011
Mobile-9810612898
http://subodh-cowsinindia.blogspot.com
http://www.scribd.com/subodh1934
 

Advertisements