मन्दग-मन्दोदरी

Puraanic contexts of words like Mandara, Mandaakini, Mandira / temple, Mandehaa, Mandodari etc. are given here.

मन्दगा ब्रह्माण्ड १.२.१६.३८(मन्दगा व मन्दगामिनी : शुक्तिमान् पर्वत से नि:सृत नदियों में से २), मत्स्य ११४.३२(मन्दगा व मन्दवाहिनी : शुक्तिमान् पर्वत से नि:सृत नदियों में से २), वायु ४५.१०७(मन्दगा व मन्दवाहिनी : शुक्तिमान् पर्वत से नि:सृत नदियों में से २) mandagaa

 

मन्दर देवीभागवत ८.५.१७(मेरु पर्वत के ४ स्तम्भों में से एक, आम्र वृक्ष का स्थल), नारद २.८(ब्रह्मा द्वारा प्रोक्त मन्दराचल की महिमा का कथन), पद्म ३.१५.३(त्रैपुर वध में शिव द्वारा मन्दर को गांडीव तथा वासुकि को गुण बनाने का उल्लेख), ४.८.२१(विष्णु द्वारा मन्दर को घर्घर व सर्प को वेष्टन बनाकर समुद्र मन्थन का आदेश), ६.६०.२२(एकादशी व्रत के प्रभाव से शोभन द्वारा मन्दराचल पर देव पुर को प्राप्त करने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड १.२.१३.३६(मेरु व धारणी – पुत्र, ३ भगिनियों के नाम), १.२.१६.२०(भारतवर्ष के पर्वतों में से एक), १.२.१९.५६ (कुश द्वीप के पर्वतों में से एक, मन्दर पर्वत के कपिल वर्ष का उल्लेख, नाम की निरुक्ति : मन्दा नामक आप: का दारण करने वाले), ३.४.९.५१(विष्णु द्वारा मन्दर को मन्थान बनाकर समुद्र का मन्थन करने का निर्देश, समुद्र मन्थन का वृत्तान्त), भविष्य २.१.१७.१४(गजाग्नि का नाम), ४.१९५.२१(मन्दराचल की महिमा, कदम्ब का स्थान), भागवत १.३.१६(विष्णु द्वारा कूर्म रूप में पृष्ठ पर मन्दर को धारण करने का उल्लेख), ३.२८.२७(विष्णु की बाहुओं के वलयों आदि के समुद्र मन्थन के समय मन्दराचल की रगड से अधिक उजले होने का उल्लेख), ५.१६.११(मेरु की चार दिशाओं में मन्दर, मेरुमन्दर आदि पर्वतों की स्थिति का उल्लेख, मन्दर पर चूत वृक्ष की स्थिति), ७.३.२(हिरण्यकशिपु द्वारा मन्दरद्रोणी में तप), ८.५.१०(विष्णु द्वारा कूर्म रूप धारण कर मन्दर को धारण करने का उल्लेख), ८.६.२२(समुद्र मन्थन में मन्दर के मन्थान बनने का उल्लेख), ८.६.३३(मन्दर गिरि को वहन करने में देवों व असुरों का असमर्थ होना, गरुडध्वज विष्णु द्वारा मन्दर का वहन), १२.१३.२(कूर्म पृष्ठ पर मन्दर गिरि के भ्रमण से कण्डू/खुजली नाश का उल्लेख), मत्स्य १३.२८(मन्दर पर देवी के कामचारिणी नाम का उल्लेख), ८३.३१(मन्दराचल पूजा मन्त्र), १२२.६१(सम्पूर्ण धातुओं से युक्त व सुन्दर मन्दर पर्वत का उपनाम ककुद्मान्, कुश द्वीप के पर्वतों में से एक), २६९.३२(१२ भूमियों वाले प्रासाद की मन्दर संज्ञा), २६९.४७(मन्दर प्रासाद का विस्तार मेरु से ५ हस्त कम(४५) होने का उल्लेख), मार्कण्डेय ५२/५५(मन्दर के परित: वन, सर, शैल), ६३.१०/६०.१०(स्वरोचि का मन्दर पर्वत पर विद्याधर – सुता मनोहरा से मिलन, राक्षस का उद्धार आदि), लिङ्ग १.५३.९(मन्दराचल की निरुक्ति : मन्दा नामक आपः को धारण करने वाला), वराह ७७.९(मेरु के पूर्व में मन्दर पर्वत की स्थिति का उल्लेख ; मन्दर के शृङ्ग पर कदम्ब वृक्ष की स्थिति का कथन), ९२.१(मन्दराचल पर वैष्णवी देवी द्वारा तप करने, कुमारियों के प्रकट होने तथा नारद के आगमन का कथन), वामन २.५(शिव द्वारा मन्दर पर्वत पर विश्राम), ५१.७४(शिव आगमन से पर्वतराज मन्दर द्वारा प्रसन्नतापूर्वक शिव की गणों सहित पूजा), ५४.३७(देवराज से ऐन्द्र पद हरण होने के भय से युक्त देवताओं का मन्दर पर्वत पर जाकर शिव – पुत्र उत्पन्न न होने की युक्ति करना), वायु ३०.३३(मेरु व धारणी – पुत्र, ३ भगिनियों के नाम), ३५.१६(पूर्व दिशा में मेरु के पाद रूप में मन्दर का उल्लेख), ३५.२०(मन्दर के शृङ्ग पर स्थित वृक्ष का कथन), ३६.१९(अरुण सरोवर के पूर्व में स्थित शैलों में से एक), ४९.५०(कुश द्वीप के पर्वतों में से एक, नाम की निरुक्ति: मन्दा नामक आपः का दारण करने वाला), ४५.९०(भारतवर्ष के पर्वतों में से एक), ४८.२३(मन्दर पर्वत पर अगस्त्य के भवन की स्थिति का उल्लेख), ६९.१५५/२.८.१५०(मन्दरशोभि : मणिभद्र व पुण्यजनी के २४ यक्ष पुत्रों में से एक), विष्णु २.२.१८(मेरु के पूर्व में इलावृत में मन्दर पर्वत की स्थिति का उल्लेख), शिव २.५.८.९(त्रिपुर वधार्थ शिव के रथ में मन्दर के रथनीड बनने का उल्लेख), ७.१.१७.५१(मेरु व धरणी – पुत्र), ७.१.२४.२(सती दाह के पश्चात् शिव का मन्दराचल पर तप, पर्वत की शोभा का कथन), स्कन्द ३.३.१०(मन्दर ब्राह्मण की पिङ्गला वेश्या में आसक्ति, ऋषभ योगी की सेवा से जन्मान्तर में भद्रायु नामक राजकुमार रूप में जन्म), ४.१.१.५७(मन्दर पर्वत के मन्दलोचन होने का उल्लेख), ४.२.६४.३(मन्दर पर्वत पर देवताओं के जाने का उल्लेख), ५.३.१९८.६५(मन्दर पर देवी के कामचारिणी नाम का उल्लेख), हरिवंश २.८६.४४(मन्दराचल पर दिव्य मन्दार व सन्तान पुष्पों की उत्पत्ति, नारद द्वारा अन्धकासुर को प्रलोभन), वा.रामायण ७.४.२४(विद्युत्केश – पुत्र सुकेश को राक्षसी सालकटङ्कटा द्वारा मन्दराचल पर जन्म देने का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.१५४(मन्दर पर्वत का रैवत गिरि पर स्थित होना), कथासरित् १४.४.१७८ (अग्नि में प्राण त्याग को उद्धत मन्दर – कन्या मतङ्गिनी से नरवाहनदत्त का विवाह), १४.४.१९५(मन्दर द्वारा नरवाहनदत्त को मन्दरदेव को जीतने का उपाय बताना), १७.१.५३(मन्दर पर्वत पर पार्वती द्वारा अपने गणों को शाप देने का वृत्तान्त ) mandara

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मन्दरदेव कथासरित् १४.३.६९(उत्तरवेदी में स्थित राजा मन्दरदेव के अजेय न होने का उल्लेख), १४.४.१९५(मन्दर द्वारा नरवाहनदत्त को मन्दरदेव को जीतने का उपाय बताना), १५.१.१०८(नरवाहनदत्त व मन्दरदेव की सेनाओं के युद्ध का वृत्तान्त), १५.१.१३७(मन्दरदेव की भगिनी मन्दरदेवी द्वारा नरवाहनदत्त को मन्दरदेव के वध से रोकना ), द्र.भूगोल mandaradeva

 

मन्दहास गर्ग ७.२२.५४( मौरङ्ग देश के राजा मन्दहास द्वारा प्रद्युम्न की शरण स्वीकार करना), ७.४२.१५(वसु – पुत्र मन्दहास का जन्मान्तर में भूतसन्तापन रूप में जन्म),

 

मन्दाकिनी पद्म ५.६.१८(विश्रवा की २ पत्नियों में से एक, धनद – माता), भागवत ५.१९.१८(भारत की नदियों में से एक), १०.७०.४४(नदियों में मन्दाकिनी द्वारा स्वर्ग को, भोगवती द्वारा पाताल को व गङ्गा द्वारा मृत्यु लोक को पवित्र करने का उल्लेख), मत्स्य ११४.२५(ऋक्ष पर्वत से प्रसूत नदियों में से एक), १२१.४(कैलास पर्वत पर मन्दोदक सरोवर से मन्दाकिनी के नि:सृत होने का उल्लेख, मन्दाकिनी के तट पर नन्दन वन की स्थिति का उल्लेख), १९९.३(मन्दाकिन्य : कश्यप कुल के गोत्रकार ऋषियों में से एक), वामन ५७.७६(मन्दाकिनी द्वारा स्कन्द को गण प्रदान), ७२.४४(ज्योतिष्मान् द्वारा मन्दाकिनी नदी के किनारे तपस्या करना), वायु ४१.१४(कैलास पर्वत पर मन्दाकिनी की शोभा का कथन), ४५.९९(ऋक्ष पर्वत से नि:सृत नदियों में से एक), ४७.३(कैलास पर्वत के मन्द नामक जल से मन्दाकिनी नदी की उत्पत्ति तथा मन्दाकिनी तीर पर नन्दन वन की स्थिति का कथन), स्कन्द ४.२.९७.१४८(मन्दाकिनी तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.१.२६.५९(उज्जयिनी में शिव द्वारा मन्दाकिनी नाम का कुण्ड बनाना), ५.१.२६.६८(मन्दाकिनी के दर्शन व स्नान का माहात्म्य), ५.३.६.३४(नर्मदा के मन्दाकिनी नाम का कारण : मन्द गति से बहना), महाभारत अनुशासन १०२.१८(मन्दाकिनी तट को प्राप्त करने वाले मनुष्य के लक्षण : इन्द्र – गौतम संवाद), वा.रामायण २.९५(राम द्वारा मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन), ५.३८.१३(हनुमान के पहचान चिह्न मांगने पर सीता द्वारा मन्दाकिनी के समीप चित्रकूट पर घटी घटनाओं का वर्णन करना), ७.११.४२(विश्रवा मुनि द्वारा पुत्र कुबेर को मन्दाकिनी नदी से युक्त कैलास पर्वत पर निवास करने का परामर्श), कथासरित् १५.१.४४(मन्दाकिनी नदी का संक्षिप्त माहात्म्य ) mandaakinee/ mandakini

 

मन्दार गणेश २.३४.१३(धौम्य – पुत्र, शमीका – पति, भ्रूशुण्डि का अपमान करने पर शाप प्राप्ति), २.३५.१८(गणेश द्वारा मन्दार मूल में स्थित होने का वर), २.४५.४(मरीचि द्वारा मन्दार मूल में तप का उल्लेख), गर्ग २.२०? (कृष्ण द्वारा मन्दार पुष्प का उत्तरीय धारण), ७.१०.२३(तैलङ्गराज विशालाक्ष की पत्नी मन्दारमालिनी द्वारा राजसूय यज्ञ हेतु प्रद्युम्न के आगमन का भान कराना), ७.४२.१५(परावसु गन्धर्व के मन्दार, मन्दर आदि ९ पुत्रों का जन्मान्तर में शकुनि, शम्बर आदि दैत्यों के रूप में जन्म), नारद १.६७.६२(शक्ति को मन्दार पुष्प अर्पण का निषेध), पद्म १.२१.२९०(मन्दार सप्तमी व्रत), ब्रह्माण्ड २.३.४१.२७(परशुराम द्वारा शिव के गणों में एक मन्दार के दर्शन का उल्लेख), ३.४.३२.३३(मन्दार वाटिका में शरद ऋतु आदि द्वारा ललिता देवी की रक्षा का कथन), भविष्य ४.४०(मन्दार षष्ठी व्रत में सूर्य पूजा), ४.८८(गन्ध विनाशन व्रत के अन्तर्गत ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को श्वेत मन्दार आदि की पूजा का कथन), मत्स्य ७९(मन्दार सप्तमी व्रत के अन्तर्गत माघ शुक्ल सप्तमी को अष्टदल कमल पर सूर्य की पूजा), वराह १४३(मन्दार तीर्थ का माहात्म्य व अन्तर्वर्ती तीर्थ), स्कन्द ४.२.७६.७८(मन्दारदाम विद्याधर के पुत्र परिमलालय की कथा), ७.१.१७.११४(मन्दार पुष्प की महिमा), हरिवंश २.८६.५१(नारद द्वारा अन्धक से मन्दार वन व पुष्प की महिमा का कथन ), महाभारत अनुशासन १४.७४(हिरण्यकशिपु- पुत्र, ग्रह संज्ञा आदि ) mandaara

 

मन्दारवती कथासरित् १२.९.६(तीन ब्राह्मण – पुत्रों की मन्दारवती से विवाह की इच्छा, मन्दारवती की मृत्यु व पुनर्जीवन पर मन्दारवती के वास्तविक पति का प्रश्न), १२.३४.६१(महासेन – पुत्र सुन्दरसेन द्वारा मन्दारदेव – कन्या मन्दारवती को प्राप्त करने के उद्योग में विभिन्न बाधाओं का वर्णन, अन्त में सुन्दरसेन व मन्दारवती का मिलन ) mandaaravatee/ mandaaravati

 

मन्दिर अग्नि ३८(मन्दिर निर्माण का फल), ३९(मन्दिर निर्माण हेतु भूमि परिग्रह विधान), ४३(मुख्य मन्दिर के परित: देवों के मन्दिरों का वर्णन), गर्ग ९.६(हरिमन्दिर निर्माण, विग्रह प्रतिष्ठा व पूजन विधि), नारद १.१३.१२१(मन्दिर में पूजा, सेवा आदि का महत्त्व), पद्म ४.२(मन्दिर के मार्जनादि का माहात्म्य, दण्डक चोर द्वारा अनायास मन्दिर के लेपन से स्वर्ग प्राप्ति का वृत्तान्त), ४.६.३१(वेश्या द्वारा मन्दिर में अनायास ताम्बूल चूर्ण दान से स्वर्ग प्राप्ति का कथन), भविष्य १.९५(आदित्यालय का माहात्म्य), १.१३०(सूर्य मन्दिर निर्माण की विधि), वराह १३९(मन्दिर सम्मार्जन, गायन, लेपन का फल, चाण्डाल – ब्रह्मराक्षस की कथा), वामन ९४.३७(ज्यामघ द्वारा मन्दिर निर्माण), स्कन्द २.२.२०(इन्द्रद्युम्न राजा द्वारा मन्दिर का निर्माण), लक्ष्मीनारायण २.१३६-१६०(श्रीहरि द्वारा देवायतन भक्त को मन्दिर निर्माण की विस्तृत विधि का वर्णन), २.१४०.१६(मन्दिर प्रासाद के लक्षण), २.१४०.२३ (मन्दिर प्रासाद के लक्षण), २.१४०.९१(मन्दिर प्रासाद के लक्षण), २.१४३.९९(मन्दिर के अङ्गों का पुरुष के अङ्गों से तादात्म्य ) mandira

 

मन्देहा देवीभागवत ११.१६.५३(सूर्य के भक्षण के इच्छुक मन्देहा राक्षसों का अर्घ्य/उदक क्षेपण से नाश), ब्रह्माण्ड १.२.२१.११०(सन्ध्या काल में ३ कोटि मन्देहा राक्षसों के सूर्य से युद्ध का कथन), लिङ्ग २.५१(वज्रेश्वरी विद्या द्वारा मन्देहा राक्षसों पर जय), वराह २०१(मन्देहा राक्षसों का चित्रगुप्त से प्राकट्य, यमदूतों से संघर्ष), वायु ५०.१६२(सन्ध्या काल में मन्देहा राक्षसों द्वारा सूर्य को ग्रसने की चेष्टा, सूर्य से युद्ध तथा सन्ध्यावन्दन में अभिमन्त्रित जल के क्षेपण से मन्देहा राक्षसों के जलने का कथन), विष्णु २.४.३८(कुश द्वीप में शूद्र जाति), २.८.४९(सन्ध्या काल में मन्देहा राक्षसों के नाश के उपाय रूप में अग्निहोत्र आदि का कथन), स्कन्द ४.१.१.५६(मन्देहा राक्षसों की देह संदेह के कारण प्रसिद्धि का उल्लेख), महाभारत आश्वमेधिक ९२दाक्षिणात्य पृष्ठ ६३३९(सावित्री का जप करके अभिमन्त्रित जल से मन्देहों के विनाश का निर्देश), वा.रामायण ४.४०.४१(शाल्मलि द्वीप में मन्देहा नामक राक्षसों का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.३६०.३(चित्रगुप्त द्वारा मन्देहा राक्षसों को पापियों को पीडा देने के निर्देश का कथन ) mandehaa

 

मन्दोदरी देवीभागवत ५.१७+ (चन्द्रसेन व गुणवती – पुत्री, पति हेतु कम्बुग्रीव व वीरसेन का तिरस्कार, अन्त में दुराचारी चारुदेष्ण से विवाह कर दुःख प्राप्ति), १२.६.१२५(गायत्री सहस्रनामों में से एक), ब्रह्माण्ड ३.६.२९(मय व रम्भा – कन्या, दुन्दुभि आदि ६ दानवों की भगिनी), भविष्य ३.४.१३(मायी – भगिनी, मय – पुत्री मन्दोदरी द्वारा विष्णु भक्ति), मत्स्य ६.२१(मय की कन्याओं में से एक), वायु ६८.२९/२.७.२९(मय की सन्तानों में से एक), विष्णुधर्मोत्तर १.२२०.३६(रावण द्वारा मय – पुत्री मन्दोदरी का वरण करने और मेघनाद पुत्र उत्पन्न करने का उल्लेख), स्कन्द ५.३.३५.९(मय व तेजोवती – पुत्री, रावण द्वारा वरण, मेघनाद पुत्र का जन्म), वा.रामायण ५.१०, ७.१२(मय व हेमा – कन्या मन्दोदरी का रावण से विवाह ) mandodaree/ mandodari