मध्यम

 

सारणीबद्ध तत्त्वानां अध्यात्म मध्ये गौरवं

आधुनिक विज्ञाने ११० तत्त्वानां आवर्त सारणी मध्ये परिगणनं तार्किक दृष्ट्या ध्रुव सत्यं वर्तते, किन्तु एष विषयः वैदिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र मध्ये किं गुरुत्वं क्षिपति, न कोपि जानाति। विषयस्य प्रवर्तन हेतु आवर्त सारणी मध्ये चतुर्थ समूहस्य तत्त्वानां गुणानि विचारिष्यामः। वैदिक साहित्य मध्ये अयं समूहः मध्यम नाम धारण कर्तुं शक्नोति। मध्यमस्य प्रथम अपेक्षा शुनः, शून्य, कार्य-कारण रहित पापरहित स्थिति वर्तते। पुराणेषु कथ्यन्ते यत् मध्याह्न काले किंचित् क्षणेषु पर्यन्तं सूर्यः स्वस्य रथात् अश्वानां विलग्नं करोति। भागवत पुराणे मध्यमस्य चत्वारि लक्षणानि विद्यन्ते- ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ अर्थात् यः ईश्वरेण साकं प्रेमं करोति, ईश्वरस्य आधीनेषु मैत्री करोति, बालिशेषु अथवा स्कन्नीभूयेषु कृपा करोति तथा द्वेषिणां उपेक्षा करोति, स मध्यमः भवति। अयं विचारणीय विषयः अस्ति यत् आवर्त सारणीस्थ चतुर्थ समूहे चत्वारि लक्षणानि घट्यन्ते वा न वा। चतुर्थ समूहस्य तत्त्वानां मध्ये शुनं गुणः किंचित् स्वल्प रूपेण वर्तते, यत् ते अतीव अक्रिय अवस्थायां भवन्ति। अक्रिय अवस्थायां विद्यमाने अपि कार्बन नामधेय तत्त्वः जीवन धारण हेतु आधारं भवति, अयं तथ्यः प्रेमस्य परिचायकं भवितुं शक्नोति। अन्य त्रयः लक्षणानि भौतिक रूपेण कथं प्रकटी भवन्ति, एष भविष्ये संशोधनस्य विषयं वर्तते। सोमयागस्य माध्यन्दिन सवनस्य कृत्याणां अपि सम्यक् व्याख्या अपेक्षितं भवति, तदानीं एव वयं चत्वारि लक्षणानां हृदयंगम कर्तुं शक्नुयामः। माध्यन्दिन सवने मरुद्गणानां इन्द्रेण साकं मैत्री अपेक्षितं भवति, यत् किंचित् सभायां मध्ये अस्ति, तत् पौष्कलं कर्तुं अपेक्षा भवति इत्यादि। संगीत शास्त्रे अपि रागेषु मध्यम स्वरः भवति। अहोरात्र मध्ये रागस्य गानहेतु किं कालः अस्ति, एषः रागमध्ये मध्यम स्वरस्य स्थिति एवं तीव्रता अनुसारेण निर्णीयते। अयं प्रतीयते यत् मध्यम स्थितिषु आत्मनः अव्यक्त वाक् प्रकटी भवति एवं निर्देशं करोति यत् अस्मिन् काले अयं कृत्यः करणीयं भवति।

 

 

 

सारणीबद्ध तत्त्वानां अध्यात्म मध्ये गौरवं

आवर्त सारणी में ब्रह्माण्ड में विद्यमान लगभग ११० भौतिक तत्त्वों को आठ समूहों व सात आवर्तों में स्थापित किया जाता है। जब से तत्त्वों का वर्गीकरण आवर्त सारणी के रूप में किया गया है, तब से तत्त्वों के बारे में सभी भ्रम समाप्त हो गए हैं। आवर्त सारणी के आधार पर तत्त्वों के भौतिक गुणों की सम्यक् व्याख्या की जा सकती है। लेकिन क्या आवर्त सारणी का कोई आध्यात्मिक महत्त्व भी है, इस बारे में केवल भ्रम की स्थिति ही बनी हुई है। केवल इतना ही अनुमान लगाया गया है कि जैसे संगीत में सात स्वर होते हैं, इसी प्रकार आवर्त सारणी के सात आवर्त(period) होने चाहिएं।  लेकिन अधूरे ज्ञान के कारण यह अनुमान हमें कहीं नहीं पहुंचाता। आवर्त सारणी के आध्यात्मिक रहस्य का एक अनुमान इसके मध्यम स्तम्भ या समूह(column) के आधार पर लगाया जा सकता है। जैसा कि नीचे सारणी में दिखाया गया है, चतुर्थ

 

 

   समूह III समूह IV समूह V
आवर्त II बोरोन कार्बन नाईट्रोजन
आवर्त III एल्युमिनम सिलिकन फास्फोरस
आवर्त IV गैलियम जर्मेनियम आर्सेनिक
आवर्त V इण्डियम वंग/टिन एण्टिमनी
आवर्त VI थैलियम सीसा/लैड बिस्मथ

 

 

या मध्यम समूह में जो तत्त्व विद्यमान हैं, उनके नाम हैं – कार्बन, सिलिकन, जर्मेनियम, टिन/वंग व लैड/सीसा। यह तो सर्वविदित ही है कि सारा जीवन कार्बन तत्त्व पर आधारित है। कार्बन के परमाणुओं में परस्पर मिलकर लम्बी शृङ्खला बनाने का गुण है जिसके कारण जीवन को धारण करने वाले लम्बे अणुओं का निर्माण हो जाता है। इस समूह के अन्य तत्त्वों जैसे सिलिकन, जर्मेनियम, वंग, सीसा में लम्बी शृङ्खला बनाने का गुण नहीं है। अपितु, यह कहा जा सकता है कि जीवन धारण करने के लिए कार्बन तत्त्व जितना सक्रिय है, इस समूह के अन्य तत्त्व उतने ही अधिक अक्रिय होते गए हैं। इस समूह के तत्त्वों के पीछे क्या अध्यात्म हो सकता है, यह समझने के लिए हम वैदिक शब्द मध्यम पर ध्यान देते हैं। जब सूर्य मध्याह्न काल में आकाश में ऊपर विद्यमान होता है तो उसे सूर्य की मध्यम स्थिति कहा जाता है। मध्याह्न काल के सूर्य की स्थिति को जीवन की सर्वाधिक विकसित स्थिति कहा जा सकता है। इसके विपरीत बीज की सुप्तावस्था है। चतुर्थ समूह के तत्त्व सूर्य रूप हैं या बीज रूप, यह विचारणीय है। पुराणों में कहा गया है कि मध्याह्न काल में एक क्षण ऐसा होता है जिसमें सूर्य अपने रथ के घोडों को खोल कर रथ से अलग कर देता है, एक क्षण के लिए आकाश में ठहर जाता है। इसका संभावित अर्थ कारण-कार्य से रहित स्थिति हो सकता है। एक समाधि को प्रस्थान की स्थिति होती है, दूसरी समाधि और तीसरी समाधि से व्युत्थान। इस प्रकार समाधि मध्यम स्थिति हुई। वेद में मध्यम स्थिति को शून्य या शुनः नाम दिया गया है। आधुनिक विज्ञान के आधार पर शुनः स्थिति को उपग्रह प्रक्षेपण प्रक्रिया के माध्यम से समझा जा सकता है। जब किसी उपग्रह का आकाश में प्रक्षेपण किया जाता है तो पहले तो वह पृथिवी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की विपरीत दिशा में गति करता है। एक स्थिति ऐसी आती है कि वह पृथिवी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर हो जाता है। वह शुनः, शून्य स्थिति कही जा सकती है। शुनः अवस्था प्राप्त करने से पूर्व साधना की अन्य अवस्थाओं को प्राप्त करना पडता है, गुरुत्वाकर्षण शक्ति के विपरीत दिशा में गति करनी होती है। वैदिक व पौराणिक साहित्य में इस स्थिति को रोहित(आरोहण करने वाला) नाम दिया गया है और एक आख्यान रचा गया है कि हरिश्चन्द्र का पुत्र रोहित ६ वर्ष तक अरण्य में विचरता रहा और सातवें वर्ष में उसने शुनःशेप मानव को बलि हेतु प्राप्त किया।

संगीत में कोई राग किस समय गाया जाना है, इसका निर्धारण उस राग में विद्यमान मध्यम स्वर की स्थिति तथा तीव्रता के आधार पर किया जाता है। रात्रिकाल जितना निकट आता जाएगा, मध्यम स्वर की तीव्रता उतनी ही अधिक होती जाएगी(संगीत में मध्यम स्वर दो होते हैं – शुद्ध मध्यम और तीव्र मध्यम)। वैदिक व पौराणिक साहित्य में मध्यम स्थिति में एक और लक्षण प्रकट होता दिखाया गया है – वह है अव्यक्त वाक्। आत्मा की आवाज आने लगती है कि अब यह करना चाहिए, यह नहीं।

 

मध्य अथवा शुनः स्थिति प्राप्त करने के पश्चात् साधना में आगे प्रगति करनी होती है। पौराणिक साहित्य में कहा गया है कि शुनः स्थिति वह होती है जहां शिव की पूजा तो की जाती है, पार्वती की नहीं। अर्थात् प्रकृति से रहित पुरुष की स्थिति। प्रकृति को भी अपने अनुकूल बनाना होता है, तभी शुनः, शून्य स्थिति सार्थक होती है। इस स्थिति को आगे भागवत पुराण के आधार पर समझा जा सकता है। भागवत पुराण ११.२.४६ का कथन है –

ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।

प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥

अर्थात् मध्यम (भक्त) वह है जो ईश्वर में प्रेम, उसके आधीनों से मैत्री, बिखरे हुओं पर कृपा और द्वेष करने वालों की उपेक्षा करता है। यदि मध्यम स्थिति, कारण-कार्य के रहित स्थिति को, पाप से रहित स्थिति को प्राप्त कर लिया गया है तो यह अपेक्षित है कि अपने परितः प्रेम का विस्तार किया जाए। वैदिक साहित्य में इसे दिशाओं में फैलना कहा गया है। इसका सरल उदाहरण दीपावली के दिन गणेश-लक्ष्मी की पूजा के द्वारा दिया जा सकता

है। गणेश शुनः का प्रतीक है, लक्ष्मी प्रेम का। आवर्त सारणी के चतुर्थ समूह के तत्त्वों में भी यह गुण होना चाहिए। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, कार्बन तत्त्व में जीवन का विकास करने की क्षमता है। जीवन के विकास को गुरुत्वाकर्षण की विपरीत दिशा में गति करने की ओर एक कदम कहा जा सकता है। जीवन, प्राण गुरुत्वाकर्षण शक्ति के विपरीत दिशा में ही गति करते हैं। पृथिवी पर जितनी वनस्पतियां उगती हैं, उनमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति की विपरीत दिशा में वर्धन करने की क्षमता है। और जो प्राणी गतिशील हैं, उनकी तो बात ही क्या है। जीवन से आगे शून्य स्थिति, जहां कारण-कार्य नियम लागू न होता हो, की खोज की जानी चाहिए। इससे भी आगे प्रेम के विस्तार की घटना को सोच सकते हैं। बीज को भी शुनः का रूप कहा जा सकता है। चतुर्थ समूह के परितः विद्यमान तत्त्वों को भौतिक प्रेम का रूप कहा जा सकता है। प्रेम को कनिष्ठ, सबसे छोटा कहा गया है। वैदिक साहित्य में शुनःशेप के कनिष्ठ भ्राता को मधुच्छन्दा नाम दिया गया है।

भागवत पुराण के श्लोक के अन्य तीन लक्षणों – मैत्री, कृपा व उपेक्षा की यथासंभव व्याख्या नीचे देने का प्रयास किया जाएगा।

वैदिक साहित्य में मित्र का अर्थ होता है वह स्थिति जहां हम किसी भी प्रकार से अपने परितः स्थित जगत का अहित न सोचें, हमारे परितः कोई भी हिंसा न होने पाए। वेदों और पुराणों में मरुत नामक विभिन्न प्राणों को इन्द्र के, परमात्म तत्त्व के सखा बनाना पडता है, दोनों मिल कर एक दूसरे से सहयोग करें। भौतिक रूप में आवर्त सारणी के संदर्भ में इसका क्या अर्थ होगा, यह अन्वेषणीय है। कार्बन तत्त्व में तो मैत्री गुण विद्यमान है, लेकिन सिलिकन तत्त्व में यह गुण विद्यमान नहीं है।

भागवत के श्लोक में बालिशः से जुडे तृतीय लक्षण कृपा के संदर्भ में, वैदिक साहित्य में कृपा का अर्थ क्लृप, सामर्थ्य, सृजन करना भी होता है। बाल स्थिति बिखरी हुई ऊर्जा को कहते हैं। चाहे किसी तन्त्र की अव्यवस्था, एण्ट्रांपी कितनी भी अधिक क्यों न बढ गई हो, हमें उसमें से कल्प वृक्ष की भांति सृजन करने में समर्थ होना चाहिए, न्यूनतम एण्ट्रांपी वाला कोई तन्त्र विकसित करने में समर्थ होना चाहिए। पुराणों में बाल स्थिति के संदर्भ में बाली वानर तथा बलि असुर की कथाएं हैं। चतुर्थ समूह के तत्त्वों के संदर्भ में इस तथ्य का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है, यह अन्वेषणीय है।

भागवत के श्लोक में चतुर्थ लक्षण उपेक्षा के संदर्भ में कहा गया है कि द्वेष करने वालों की उपेक्षा करे। यदि तन्त्रों की अव्यवस्था/एण्ट्रांपी के संदर्भ में सोचा जाए तो अव्यवस्था की एक स्थिति ऐसी आती है जहां ऊर्जा का आगे उपयोग करना, उससे काम लेना संभव नहीं रहता, उसकी उपेक्षा ही करनी पडती है। अध्यात्म में कहा जाता है कि कुछ दुःखद परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि कष्टों को सहना ही पडता है, उनका कोई उपाय नहीं है। चतुर्थ आवर्त समूह के संदर्भ में इसका क्या उपयोग हो सकता है, यह अन्वेषणीय है। सीसा ऐसा तत्त्व है जिसे एक प्रकार से जीवन के लिए अनुपयोगी कहा जा सकता है।

मध्यवर्ती समूह के तत्त्वों में प्रथम तत्त्व कार्बन है। वैदिक साहित्य में कार्बन जैसा तो कुछ है नहीं, केवल अंगारों की विभिन्न स्थितियों का उल्लेख आता है कि यदि वह उल्मुक स्थिति में है तो इस देवता का प्रतीक है, यदि दीप्त में है तो इस देवता का, यदि अवशान्त है तो अङ्गिरसों का इत्यादि। जब अंगारों का उल्लेख आता है तो अंगारों का ऊष्णत्व किस ऊर्जा के कारण है? क्या यह जीवन शक्ति है जिसे अंगार कहा जा रहा है? उल्लेख आता है कि पृथिवी ने अपना श्रेष्ठतम भाग रथन्तर साम द्वारा चन्द्रमा में कृष्ण रूप में स्थापित किया और सूर्य ने अपना भाग पृथिवी में ऊष के रूप में बृहत् साम द्वारा स्थापित किया। यह विचारणीय है कि पृथिवी के श्रेष्ठतम भाग का क्या स्वरूप होगा? पृथिवी के पास तो गुरुत्वाकर्षण शक्ति है और पृथिवी के गौ रूप के पास सूर्य की किरणों का अवशोषण करके उनको जीवन में बदलने की, किरणों को अक्षुण्ण बनाने की शक्ति है। श्री गोवान द्वारा कहा गया है कि पृथिवी अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा सूर्य की किरणों कों अनन्त ब्रह्माण्ड में विस्तारित होने से रोकती है। अतः यह एक विचारणीय विषय है कि क्या पृथिवी का गौ रूप आधुनिक विज्ञान का कार्बन तत्त्व है?

पृथिवी पर जो ऊषर भूमि दिखाई देती है, वह सूर्य का अंश है। वैदिक साहित्य में पुरीष का भी महत्त्व है जिसमें ज्योति छिपी रहती है। पुरीष, ऊषर भूमि यह सिलिकन से निर्मित हैं। आधुनिक युग में सौर ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए सोलर सैल सिलिकन से बन रहे हैं।     चतुर्थ समूह का एक तत्त्व वंग/टिन है। संस्कृत भाषा में वंग वंकु धातु से निर्मित प्रतीत होता है जिसका अर्थ कुटिल गति है। अध्यात्म में कुटिल गति से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह अन्वेषणीय है। लौकिक रूप में इसका रूपान्तर बांके बिहारी की छवि है। क्या इसका अर्थ यह है कि भक्त जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, यह आवश्यक नहीं कि ईश्वर उसे वही दे। वह छल भी कर सकता है।

चतुर्थ समूह का अन्तिम तत्त्व सीसा/लैड है। वैदिक साहित्य में सीसा नपुंसक को देने का निर्देश है।

आवर्त सारणी में एक समूह(column) के तत्त्वों की स्थूलता में क्रमिक रूप से वृद्धि होती जाती है। इस प्रकार कार्बन सबसे लघु/हल्का तत्त्व है, फिर सिलिकन, जर्मेनियम, वंग और सीसा या लैड में लघुता का ह्रास होता जाता है, स्थूलता में वृद्धि होती जाती है। वैदिक दृष्टिकोण से इस तथ्य को समझने के लिए हमारे पास दो उपाय हैं। एक तो सरस्वतीरहस्योपनिषद का यह कथन कि ५ अवस्थाएं अस्ति, भाति, प्रिय, नाम व रूप हैं जिनमें से प्रथम तीन अन्तर्जगत से सम्बन्धित हैं और अन्तिम दो बाह्य जगत से। अस्ति को समाधि की स्थिति कहा जा सकता है जहां अस्तित्व मात्र शेष रह जाता है, अन्य सारे आवरण समाप्त हो जाते हैं। उससे अगली स्थिति भाति की है जिसमें अपने परितः आवरण का आभास होने लगता है। उससे अगली स्थिति प्रिय की है जहां चेतना अन्तर्जगत में भी प्रवेश कर सकती है और बाह्य जगत में भी। अन्तिम २ स्थितियों को नाम व रूप कहा गया है।

एक समूह के तत्त्वों की लघुता-स्थूलता पर विचार करने के लिए दूसरा उपाय सोमयाग में पृष्ठ्य षडह नामक याग विशेष हो सकता है। इस याग में ६ सुत्या अह अथवा प्रमुख दिन होते हैं जिनमें से प्रथम अह का प्रतिनिधित्व रथन्तर साम द्वारा किया जाता है, दूसरे अह का बृहत् साम द्वारा, तीसरे का वैरूप साम द्वारा, चौथे का वैराज साम द्वारा, पांचवें का शाक्वर साम द्वारा और छठें का रैवत साम द्वारा। रथन्तर साम लघुत्तम होता है और रैवत साम स्थूलतम। रथन्तर साम में पृथिवी सूर्य रूपी अपने पुत्र को अपने मुख में रख लेती है।

 

संदर्भ

*ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः ।

सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन ॥- ऋ. ५,०५९.०६

*मध्यं वै नाभिर्मध्यमभयम्। – मा.श. १.१.२.२३

*शान्ति कर्म : अग्निं दूतं वृणीमहे इति। य एवायं मध्यमः प्राणः एतमेवैतया समिन्धे। सा हैषान्तस्था प्राणानाम्, अतो ह्यन्य ऊर्द्ध्वा प्राणाः, अतोऽन्येऽवाञ्चः। अन्तस्था ह भवति। अन्तस्थामेनं मन्यन्ते, य एवमेतामन्तस्थां प्राणानां वेद। – मा.श. १.४.३.८

*प्रजा वै पशवो मध्यम्। – मा.श. १.६.१.१७

*मध्यन्दिने मनुष्याः(वृत्रायाशनमभिहरन्ति) – मा.श. १.६.३.१२

*पुनराधानम् : यदैवोदेति – अथ वसन्तः। यदा सङ्गवः। अथ ग्रीष्मः। यदा मध्यन्दिनः – अथ वर्षाः। यदापराह्णः – अथ शरत्। यदैवास्तमेति – अथ हेमन्तः। तस्मादु मध्यन्दिन एवादधीत तर्ह्येषोऽस्य लोकस्य नेदिष्ठं भवति – मा.श. २.२.३.९

*मध्यन्दिनो मनुष्याणाम् – मा.श. २.४.२.८

*मध्यऽइव ह्ययमात्मा दक्षिणोक्थ्यस्थाली भवति, उत्तराऽदित्यस्थाली – मा.श. ४.२.२.१६

*अथ या मध्ये – ता वाग्भृतः, ता उ समानभृतः। – मा.श. ८.१.३.६

*उदरं मध्यमा चितिः। – मा.श. ८.७.२.१८

*अन्तरिक्षं वै मध्यमा चितिः। – मा.श. ८.७.२.१८

*त्रिष्टुप् छन्द इन्द्रो देवता मध्यम्। – मा.श. १०.३.२.५

*अथ इममेव (मृत्युः) नाप्नोत्। यः अयं मध्यमः प्राणः। – मा.श. १४.४.३.३१

*श्रीर्वै राष्ट्रस्य मध्यम्। – तै.ब्रा. ३.९.७.१, मा.श. १३.२.९.४

*आत्मा यजमानस्य मध्यन्दिनः – ऐ.ब्रा.  ३.१८

*आत्मा मध्यन्दिनः – कौ.ब्रा. २५.१२, २८.९, जै.ब्रा. ३.६९, ३.१४४, ३.२९०, ३.२९१

*तर्हि(माध्यन्दिने) वा एषो (आदित्यः) ऽस्य लोकस्य नेदिष्ठो भवति। – का.श.ब्रा. १.२.३.८(तु. मा.श. २.२.३.९)

*मरुत्वद् वै मध्यन्दिनस्य रूपम्। – जै.ब्रा. ३.१३, ३.२३

*मध्यन्दिने मनुष्याणाम् – जै.ब्रा. ३.२७१

*मध्यन्दिनाद् वै देवा यज्ञायज्ञीयेनोर्ध्वा स्वर्गं लोकमुदक्रामन्। – जै.ब्रा. ३.२९०

*मरुद्भ्यः सान्तपनेभ्यो मध्यन्दिने चरुम्। मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासां दुग्धे सायं चरुम् (निर्वपति)। – तै.सं. १.८.४.१

*यद् दधिघर्मेण मध्यन्दिने (चरन्ति) तेन तत् पशुमद् वीर्यावत्। – काठ.सं. २९.५, कपि.क.सं. ४५.६

*यदि मध्यन्दिने (सवने स्कन्देत्), अप ओषधीर्जनमगन्यज्ञः – – – इत्यनुमन्त्रयेत। – काठ.सं. २५.७

*तर्हि (मध्यन्दिने) तेक्ष्णिष्ठं तपति (आदित्यः) – तै.आ. २.१३.१

*ग्रीष्मे मध्यन्दिने संहितामैन्द्रीम् (आलभेत) – तै.ब्रा. २.१.२.५

*अन्तरिक्षमिव वा एषा या मध्यमा चितिः। – काठ.सं. २१.३

 

विस्तृत सारसंक्षेपः

आधुनिक विज्ञाने ११० तत्त्वानां आवर्त सारणी मध्ये परिगणनं तार्किक दृष्ट्या ध्रुव सत्यं वर्तते, किन्तु एष विषयः वैदिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र मध्ये किं गुरुत्वं क्षिपति, न कोपि जानाति। विषयस्य प्रवर्तन हेतु आवर्त सारणी मध्ये चतुर्थ समूहस्य तत्त्वानां गुणानि विचारिष्यामः। वैदिक साहित्य मध्ये अयं समूहः मध्यम नाम धारण कर्तुं शक्नोति। मध्यमस्य प्रथम अपेक्षा शुनः, शून्य, कार्य-कारण रहित पापरहित स्थिति वर्तते। पुराणेषु कथ्यन्ते यत् मध्याह्न काले किंचित् क्षणं यावत् सूर्यः स्वस्य रथात् अश्वानां विलग्नं करोति। शुनः स्थितिं आधुनिक विज्ञाने उपग्रह प्रक्षेपण प्रक्रिया द्वारा हृदयंगम कर्तुं शक्नुमः। प्रथमतया उपग्रहः पृथिव्याः गुरुत्वाकर्षण शक्त्याः विपरीत दिशायां गतिं करोति, तदनन्तरं कक्षाविशेष मध्ये स्थिरी भवति। अध्यात्म विषये शुनः/शून्य स्थिति प्रापणं आकस्मिक रूपेण क्षणमात्रे न भवति, अपितु सतत् साधनस्य अपेक्षा करोति। सार्वत्रिक आख्यानं अस्ति यत् हरिश्चन्द्रस्य पुत्रः रोहितः षट् संवत्सर पर्यन्तं अरण्य मध्ये विचरति। सप्तम संवत्सरे सः मानव बलि हेतु शुनःशेपं मानवं क्रयं करोति। अत्र रोहितः गुरुत्वाकर्षण शक्त्याः विपरीते विचरणं अस्ति।

संगीत शास्त्रे अपि रागेषु मध्यम स्वरः भवति। अहोरात्र मध्ये रागस्य गानहेतु किं कालः अस्ति, एषः रागमध्ये मध्यम स्वरस्य स्थिति एवं तीव्रता अनुसारेण निर्णीयते। यदा रात्रिकालः सन्निकटो भवति, मध्यम स्वरस्य तीव्रतायां वृद्धिं भवति। अयं प्रतीयते यत् मध्यम स्थितिषु आत्मनः अव्यक्त वाक् प्रकटी भवति एवं निर्देशं करोति यत् अस्मिन् काले अयं कृत्यः करणीयं भवति।

मध्य स्थिति प्राप्त्यनन्तरं मध्यमाया अवस्थायाः विस्तारं अपेक्षितं भवति। लक्ष्मीनारायण संहितायां कथनं अस्ति यत् शुनः अवस्था तद् भवति यदा केवलं शिवस्य अर्चनं भवति, न पार्वत्याः। अर्थात् केवल पुरुषस्य अर्चनं भवति, न तस्य शक्त्याः प्रकृत्याः। प्रकृतिं, अध्यात्म क्षेत्रे स्वस्य तथा अन्यस्य स्वभावानां अपि रूपान्तरणस्य आवश्यकता भवति। अयं रूपान्तरणः प्रेमस्य विस्तार आदि द्वारा भवति। भागवत पुराणे मध्यमस्य चत्वारि लक्षणानि विद्यन्ते- ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ अर्थात् यः ईश्वरेण साकं प्रेमं करोति, ईश्वरस्य आधीनेषु मैत्री करोति, बालिशेषु अथवा स्कन्नीभूयेषु कृपा करोति तथा द्वेषिणां उपेक्षा करोति, स मध्यमः भवति। अयं विचारणीय विषयः अस्ति यत् आवर्त सारणीस्थ चतुर्थ समूहे चत्वारि लक्षणानि घट्यन्ते वा न वा। चतुर्थ समूहस्य तत्त्वानां मध्ये शुनं गुणः किंचित् स्वल्प रूपेण वर्तते, यत् ते अतीव अक्रिय अवस्थायां भवन्ति। अक्रिय अवस्थायां विद्यमाने अपि कार्बन नामधेय तत्त्वः जीवन धारण हेतु आधारं भवति। जीवन धारणं गुरुत्वाकर्षण शक्ति तरणस्य हेतुः (रोहितः) भवति। अथ शुनः स्थितिः अपेक्षितं भवति। तत्पश्चात् प्रेमस्य विस्तारं अपेक्षितं भवति। शुनः स्थित्याः प्रेम साकं वर्तनं दीपावली उत्सवे गणेश-लक्ष्म्याः अर्चन द्वारा विशेष रूपेण स्पष्टं भवति। अत्र गणेशः शुनः अथवा शून्यात् अपि परतरस्य स्थित्याः प्रतीकं भवति तथा लक्ष्मीः प्रेमस्य प्रतीकं भवति। अन्य त्रयः लक्षणानि भौतिक रूपेण कथं प्रकटी भवन्ति, एष भविष्ये संशोधनस्य विषयं वर्तते। सोमयागस्य माध्यन्दिन सवनस्य कृत्याणां अपि सम्यक् व्याख्या अपेक्षितं भवति, तदानीं एव वयं चत्वारि लक्षणानां हृदयंगम कर्तुं शक्नुयामः। माध्यन्दिन सवने मरुद्गणानां इन्द्रेण साकं मैत्री अपेक्षितं भवति, यत् किंचित् सभायां मध्ये अस्ति, तत् पौष्कलं कर्तुं अपेक्षा भवति इत्यादि।

पृथिव्याः एकं नामधेयं गौ वर्तते।  सूर्यस्य रश्मयः गौ मध्ये सर्वाधिक रूपेण सुरक्षितं भवन्ति, न नष्टी भवन्ति, अपितु ते जीवनस्य हेतुः भवन्ति, इति सामान्य रूपेण कथ्यन्ते। अयं विचारणीयः यत् गौः एवं कार्बन तत्त्व मध्ये किं सम्बन्धं भवति। कार्बन अपि जीवनस्य रक्षकं भवति।

आवर्त सारण्याः स्तम्भे/समूहे तत्त्वानां स्थूलत्वं क्रमशः वृद्धिं प्राप्नोति। तदनुसारेण चतुर्थ स्तम्भे कार्बन लघुत्तमं भवति, तत्पश्चात् सिलिकन, जर्मेनियम, वंग, सीसा मध्ये स्थूलत्वं क्रमशः गुरुतां प्राप्नोति। अस्य तथ्यस्य आध्यात्मिक प्रकाशनं सरस्वतीरहस्योपनिषद अनुसारेण प्रयत्नं करणीयं भवति। समाधेः पञ्च स्थित्यानि भवन्ति – अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप। एषां प्रथम त्रीणि अन्तर्जगत सम्बन्धी भवन्ति तथा अन्तिम द्वयः बाह्यजगत सम्बन्धीनि। अस्ति अर्थात् समाधि मध्ये चेतनायाः अस्तित्व मात्रं शेषं भवति। अन्य आवरणाः नष्टी भवन्ति। समाधेः पश्चात् व्युत्थाने भास स्थिति भवति, आवरणस्य भासमात्रम्। तत्पश्चात् प्रिय स्थिति भवति। प्रिय स्थिति मध्यम अवस्था भवति – अन्तर्जगते अपि चेतना गमनं शक्यते, बाह्य जगते अपि।

समूह मध्ये स्थूलता वृद्धेः एकं अन्य प्रयत्नं सोमयागे पृष्ठ्यः षडह अनुसारेण कर्तुं शक्यन्ते। अस्मिन् यागे षड् अहानि भवन्ति। प्रथममहस्य मुख्य लक्षणं रथन्तरं साम भवति, द्वितीयस्य बृहत् सामः, तृतीयस्य वैरूप साम, चतुर्थस्य वैराज साम, पंचमस्य शाक्वर साम एवं षष्ठस्य वैराज साम भवति। रथन्तर सामः लघुत्तमं भवति। अस्मिन् सामे पृथिवी सूर्यं पुत्रं स्वे मुखे धारयति।