मध्यन्दिन-मनस्विनी

Puraanic contexts of words like Madhyama / middle, Mana / mind, Manasaa etc. are given here.

मध्यन्दिन ब्रह्माण्ड १.२.३५.२८(याज्ञवल्क्य के वाजी संज्ञक १५ शिष्यों में से एक), भागवत ४.१३.१३(प्रभा व पुष्पार्ण के ३ पुत्रों में से एक), वायु ६१.२५(याज्ञवल्क्य के वाजी संज्ञक १५ शिष्यों में से एक ) madhyandina

 

मध्यम देवीभागवत ७.३८.२३(शर्वाणी देवी का मध्यम नामक स्थान), पद्म ३.३६(काशी में कृष्ण द्वारा आराधित मध्यमेश का माहात्म्य), ब्रह्म २.३०.१७(ब्रह्महत्या के भय से शिव की गङ्गा में मध्यमेश नाम से स्थिति तथा कश्यप द्वारा मध्यमेश की आराधना का कथन), ब्रह्माण्ड २.३.३.५(नक्षत्रों की ३ वीथियों की मध्यम मार्ग संज्ञा), भागवत ११.२.४६(मध्यम भक्त के ४ लक्षण), महाभारत उद्योग १११.२(उत्तर दिशा की मध्यम संज्ञा का उल्लेख), वामन २२.१८(प्रयाग के मध्यमा वेदि होने का उल्लेख), वायु २१.३८(मध्यम नामक १८वें कल्प में मध्यम स्वर की उत्पत्ति का कथन), १०१.१०२/२.३९.१०२(संख्या विशेष के लिए मध्यम शब्द का प्रयोग), विष्णुधर्मोत्तर १.२४९.१०(ब्रह्मा द्वारा मध्यम को द्वीपों का अधिपति नियुक्त करने का उल्लेख), शिव ५.४४.७७ (व्यास द्वारा काशी में अभिलाषाष्टक स्तोत्र द्वारा बाल रूप धारी मध्यमेश्वर शिव की स्तुति, प्राप्त वरदान के फलस्वरूप पुराणों की रचना), स्कन्द १.२.१३.१८३(शतरुद्रिय प्रसंग में अश्वतर नाग द्वारा धान्यमय लिङ्ग की मध्यम नाम से पूजा का उल्लेख), ४.१.३३.१७७(मध्यमेश्वर : शिव शरीर में नाभि का रूप), ४.२.६७.१७७(मध्यमेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ४.२.९७.१४९(मध्यमेश लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ७.१.१०.५(मध्यम तीर्थ का वर्गीकरण – जल), कथासरित् ५.३.७२(चन्द्रप्रभा द्वारा शक्तिदेव के लिए मध्यमा भूमि पर आरोहण का निषेध, शक्तिदेव द्वारा आरोहण का वृत्तान्त ) madhyama

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मध्याह्न वायु ५०.९९(अर्यमा/सूर्य के मध्याह्न में वरुण की नगरी में होने पर सूर्य के उदय व अस्त होने के स्थान), ५०.१००(दिवाकर के मध्याह्न में सोम पुरी में होने पर सूर्य के उदय व अस्त होने के स्थान), ५०.१७१(सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न आदि कालों का निरूपण ) madhyaahna/ madhyahna

 

मन गणेश २.१३५.६(मनोमयी : सौभरि – पत्नी, क्रौञ्च गन्धर्व द्वारा धर्षण), गरुड १.२१.५मनोन्मनी, ३.५.१४(मन-अभिमानी देवों के नाम), गर्ग ३.९.२१(कृष्ण के मन से गायों व वृषभों के प्राकट्य का उल्लेख), ५.१६.२५(बन्धन और मोक्ष का कारण मन), नारद १.४३.७८(मन को विश्रम्भ में धारण करने और प्राण द्वारा ग्रहण करने का निर्देश), १.६६.११४(मन की शक्ति पूतना का उल्लेख), पद्म ६.२२६.४१(मन की निरुक्ति : म – अहंकृति, न – निषेधक), ब्रह्म १.७०.५३(देह में ह्रदय में मन का स्थान होने तथा मन के प्रजापति होने का उल्लेख), ब्रह्मवैवर्त्त १.९.२(मरीचि के मन से कश्यप प्रजापति की उत्पत्ति का उल्लेख), ३.४.६०(मन के सौन्दर्य हेतु मणि दान का निर्देश), ४.८६.९७(मर्त्य स्तर पर मन के ब्रह्मा होने का उल्लेख),  ४.९४.७(ब्रह्मा के मन रूप होने का उल्लेख), ४.९४.१०७(प्राण के विष्णु व मन के ब्रह्मा चेतन होने का कथन), ब्रह्माण्ड १.१.३.१८(मन की परिभाषा : सब भूतों की चेष्टाफल का मनन करने वाला आदि आदि, भोक्ता, त्राता, विभक्तात्मा), १.२.९.१(रुद्र द्वारा मन से सृष्ट ५ भावों के नाम), २.३.३.१६(माध्य संज्ञक १२ देवों में से एक), ३.४.३.२२(प्रलय काल में महान् द्वारा बुद्धि, मन आदि को ग्रस लेने का उल्लेख), भविष्य ३.४.२५.३२(ब्रह्माण्ड मन से मनुकारक ध्रुव व उत्तम मन्वन्तर की उत्पत्ति का उल्लेख), भागवत २.१०.३०(ह्रदय से मन, चन्द्र आदि की उत्पत्ति का उल्लेख), ३.१२.२४(ब्रह्मा के मन से मरीचि ऋषि की उत्पत्ति का उल्लेख), ५.५.५, ५.११.९(मन की १२ वृत्तियों तथा मन के क्षेत्रज्ञ से भिन्न होने का कथन), ११.२०.१८(मन को शान्त – स्थिर रखने का निर्देश), ११.२२.३६(मनुष्यों में मन के कर्ममय होने का उल्लेख), ११.२३.४३(सुख – दुःख के परम कारण मन को एकाग्र करने का निर्देश), ११.२३.४४(मन से गुणों व कर्मों के सृजन का कथन ‹ अज =मन), मत्स्य ४.२१(इन्द्रियों में मन के ११वां होने का उल्लेख), ४.२३(मन द्वारा आकाश आदि भूतों की सृष्टि करने का कथन), लिङ्ग १.७०.१३(मन की निरुक्ति), वायु ४.२८/१.४.२६( मन की निरुक्ति व उपनाम), ११.२९(मन से धारणा योग होने का उल्लेख), १७.६(त्रिदण्डों में मनोदण्ड का उल्लेख), २१.५९(२६वें मन नामक कल्प में शङ्करी देवी द्वारा प्रजा उत्पन्न करने का उल्लेख), २१.६७(ब्रह्मा के मन में पूर्ण सोम के प्रकट होने से पौर्णमासी नाम प्रथन का उल्लेख), ६६.१५/२.५.१५(तुषित संज्ञक देवों के साध्य संज्ञक गण बनने पर गण के १२ देवों में से एक), विष्णु १.२२.७१(विष्णु के सुदर्शन चक्र के मन का प्रतीक होने का उल्लेख), विष्णुधर्मोत्तर १.२४९.६(मन के सर्व इन्द्रियों के राज्य पर अभिषिक्त होने का उल्लेख), ३.४७.७(गरुड के मन का प्रतीक होने का उल्लेख), स्कन्द २.७.१९.४८(विभिन्न देवों की स्पर्द्धा में रुद्र रूपी मन के शरीर से विनिष्क्रान्त होने पर भी जीव के अस्तित्व का कथन; मन में बोधनात्मक रुद्र की स्थिति का कथन), २.७.१९.५५(मन के रुद्र में प्रवेश का उल्लेख), ५.२.६४.१८(मन रूपी बुद्धि की अस्थिरता का कथन), महाभारत वन १८१.२४(मन व बुद्धि में अन्तर), ३१३.५३(मन के यज्ञिय यजु होने का उल्लेख, यक्ष – युधिष्ठिर संवाद), शान्ति १६.२२(भीम द्वारा युधिष्ठिर को राज्य स्वीकार करके मन से युद्ध करने का प्रबोधन), २३३.१३(प्रलय काल में मन द्वारा आकाश के शब्द गुण को ग्रसने का उल्लेख, चन्द्रमा द्वारा मन को ग्रसने का उल्लेख), २५४.९(शरीर रूपी पुर में मन के मन्त्री व बुद्धि के स्वामिनी होने का कथन), २५५.९(मन के ९ गुणों के नाम), ३०१.१५(मन के ६ गुणों का उल्लेख), ३११.१६(मन के अनुसार तिर्यक् योनियों के अह व रात्रि का परिमाण ; मन के इन्द्रियों का ईश्वर होने का कथन), आश्वमेधिक २१.८(शरीरभृद्/जीव के गार्हपत्य व मन के आहवनीय होने का  कथन), २१.१५(स्थावर मन व जङ्गम वाणी के श्रेष्ठ होने का वर्णन), २१.२६(स्थावरत्व की दृष्टि से मन और जङ्गमत्व की दृष्टि से वाक् के श्रेष्ठ होने का कथन), २२.१४(मन व इन्द्रियों में श्रेष्ठता के विवाद का कथन), २२(घ्राण, चक्षु, मन, बुद्धि आदि में श्रेष्ठता की स्पर्द्धा), २५.१५(अनुमन्ता/मन के अध्वर्यु होने का उल्लेख), ३०.२८(अलर्क द्वारा मन को एकाग्र करने पर ही इन्द्रियों को मारने का वर्णन), ३४.१२(ब्राह्मण गीता के अन्तर्गत मन के ब्राह्मण व बुद्धि के ब्राह्मणी होने का उल्लेख), ४३.३४(प्रज्ञा द्वारा मन के ग्रहण आदि का कथन), ५१.१(पांच भूतों में मन के ईश्वर और भूतात्मा होने का कथन), ५१.४६(अनुगीता के अन्तर्गत कृष्ण के गुरु व मन के शिष्य होने का उल्लेख), योगवासिष्ठ १.१५.१४(अहंकार रूप विन्ध्य पर मन रूप महागज का कथन), ३.१.१४(मन की भूतात्मा संज्ञा), ३.४.४४(मन की संकल्प से अभिन्नता), ३.५(मन के परमात्मा में मूल का कथन), ३.९६(कर्म, भावना व क्रिया में सम्बन्ध का कथन, मन के जड या चेतन होने का प्रश्न, मन, बुद्धि, अहंकार आदि का विवेचन), ३.९७.३(संसार में फैले एक मन के अनेक रूपों का कथन), ३.८४.३०(मन अङ्कुर उत्पत्ति नामक सर्ग में मन द्वारा जगत भ्रान्ति निर्माण का कथन), ३.९२(मन माहात्म्य वर्णन नामक सर्ग के अन्तर्गत चेतन मन और जड देह में सम्बन्ध), ३.९३.२(ब्रह्म के सघन होने पर मन का सम्पादन और समन ब्रह्मा के संकल्प से जगत की उत्पत्ति का वर्णन), ३.९९.५(संसार महाटवी में मन रूपी महाकाय पुरुषों के भ्रमण का आख्यान), ३.९९.१०(कदली कानन आदि में भ्रमण करने वाले महाकाय पुरुषों के विभिन्न प्रकार के मन होने का कथन), ४.१७.२९(मलिन मन और शुद्ध मन में परस्पर मिलन न होने का कथन), ४.२०(मनोरूप वर्णन नामक सर्ग के अन्तर्गत शरीर पर मन के आधिपत्य का कथन), ४.५२.२४(वासनाग्रस्त होने पर बुद्धि के मन व मन के इन्द्रियता को प्राप्त होने का कथन), ५.१३.४७(जड मन के चित् तत्त्व की ओर भागने का कथन), ५.१३.८७(मन द्वारा चित् शक्ति व स्पन्द/प्राण शक्ति के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का कथन), ५.१४.६३(शरीर में मन रूपी सर्प द्वारा महान् भय उत्पन्न करने का उल्लेख), ५.८४.३९(जगत के मनोमात्रभ्रमोपम होने का कथन), ६.१.३१.३९(मन और प्राण के एक्य का प्रतिपादन), ६.१.६९.३३(मन और प्राण संयोग विचारणा नामक सर्ग में प्राण के शान्त होने पर मन द्वारा प्राणों से अलग होने तथा मन के शान्त होने पर प्राण द्वारा मन के त्याग का कथन, मन द्वारा ज्ञान प्राप्त किए बिना प्राणों को न त्यागने का कथन), ६.१.६९.३३(प्राण के साथ मन के संयोग की सूर्य और त्विषि से उपमा), ६.१.७८.२१(मन की पाषाण से उपमा का कारण), ६.२.४३.३७(मन की अर्थ से एकरूपता का वर्णन ; सम्यग~ ज्ञान से दोनों की शान्ति), ६.२.४४.३२(मनोमृग के संसार में विचरण से दुःख प्राप्ति का वर्णन, मनोमृग के चित्त भूमि में उत्पन्न वन में विश्राम का वर्णन),  ६.२.८७.११, ६.२.८७.३६(बुद्धि के घनीभूत होने पर मन संज्ञा का उल्लेख, मन द्वारा इन्द्रियों को जानने का उल्लेख), महाभारत वन ३१३.५४(युधिष्ठिर – यक्ष संवाद में मन के यज्ञीय यजु होने का उल्लेख), ३१३.६०(युधिष्ठिर – यक्ष संवाद में मन के वात से शीघ्र|तर होने का उल्लेख), ३१३.७६(युधिष्ठर – यक्ष संवाद में मन का नियमन करने से शोक उत्पन्न न होने का उल्लेख), शान्ति ३१२.११(प्रलय  काल में मन द्वारा आकाश को तथा अहंकार द्वारा मन को ग्रस लेने का कथन), ३३९.३०(आकाश के परमभूत मन में व मन के अव्यक्त में लीन होने का कथन), ३३९.३८(मन के प्रद्युम्न होने का कथन), लक्ष्मीनारायण २.७८.३९(मन का पुत्र रूप में उल्लेख), २.२५५.३९(मन के चाञ्चल्य, वेगता आदि ६ भावों के नाम ), द्र. बृहन्मना, महामना, वसुमना, सुमना, सौमनस mana

 

मन- ब्रह्माण्ड २.३.७.७(मनोभवा :  मौनेया संज्ञक २४ अप्सराओं में से एक )

 

मनसा देवीभागवत ९.४७+ (कश्यप की मानसी कन्या मनसा का कृष्ण द्वारा जरत्कारु नामकरण, जरत्कारु से विवाह, त्याग, आस्तीक नामक पुत्र प्राप्ति, सर्परक्षा, मनसा पूजा विधि), ब्रह्मवैवर्त्त १.९.२(कमलांश मनसा का कद्रू- पुत्री, जरत्कारु – पत्नी व आस्तीक – माता के रूप में उल्लेख), २.४३.३ (मङ्गलचण्डिका, षष्ठी व मनसा देवियों के दुर्गा/प्रकृति से प्राकट्य का उल्लेख), २.४५(कश्यप की मानस पुत्री, मन से उद्दीप्त होने वाली मनसा देवी का वर्णन), ४.५१(मनसा का धन्वन्तरि से युद्ध), लक्ष्मीनारायण १.४८७.१४(धन्वन्तरि व उनके शिष्यों से युद्ध में वासुकि द्वारा मनसा देवी का आवाहन, मनसा का धन्वन्तरि से युद्ध, धन्वन्तरि द्वारा मनसा देवी की स्तुति का वर्णन), २.५.१(षष्ठी उपनाम वाली मनसा देवी द्वारा अहर्निश बालकृष्ण की दैत्यों आदि से रक्षा का वर्णन, दैत्यों द्वारा षष्ठी का हरण, बालकृष्ण द्वारा निर्मित महाकालानल द्वारा षष्ठी का मोचन, षष्ठी द्वारा निर्मित कन्याओं द्वारा दैत्यों का नाश ) manasaa

 

मनस्यु अग्नि १०७.१७(मनस्य : महान्त – पुत्र, ऋषभ/भरत वंश), ब्रह्माण्ड १.२.३६.७१(मनस्य : भव्य संज्ञक देवों के गण में से एक), मत्स्य ४९.२(प्राचीत्वत – पुत्र, पीतायुध – पिता, पूरु वंश), वायु ९९.१२१/ २.३७.११७(प्रवीर – पुत्र, जयद- पिता, पूरु वंश), विष्णु २.१.३९(महान्त – पुत्र, त्वष्टा – पिता, सुमति वंश), ४.१९.१(प्रवीर – पुत्र, अभयद – पिता, पूरु वंश ) manasyu

 

मनस्विनी ब्रह्माण्ड १.२.११.७(मृकण्ड – पत्नी, मार्कण्डेय – माता), १.२.३६.९०(उत्तानपाद की २ कन्याओं में से एक), मत्स्य ४९.७(रन्तिनार – पत्नी, सन्तानों के नाम), वायु २८.५(मृकण्ड – पत्नी, मार्कण्डेय – माता), ६२.७६/२.१.७६(उत्तानपाद की २ पुत्रियों में से एक ) manasvinee/ manasvini

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