मत्स्य

According to puraanic anecdote,  Manu got from somewhere a small fish(symbolic of power of God) in his hand. Manu means that mortal soul whose mind has started moving up towards Om. After coming in the hands of Manu, the fish assumed larger and larger sizes. This means that until the power of God was confined to the levels/sheaths of food, vitality/praana and mind, it was a small fish. When the power of God starts spreading at the super mental level, it becomes larger and larger. – Fatah Singh

 

मत्स्य

टिप्पणी : (क) पुराणों की कथा के अनुसार एक छोटी मछली( ईश्वर की शक्ति ) मनु के हाथ में आ गई । मनु अर्थात् वह जीवात्मा जिसका मन ऊपर ॐ की ओर चलने लगा है । हाथ में आने के पश्चात् उसने क्रमशः विशाल और विशालतर रूप धारण कर लिए । जब तक परमात्मा की शक्ति, अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोश तक सीमित थी, तब तक वह छोटी मछली के रूप में थी । जब वह ऊपर विज्ञानमय कोश में फैलने लगी तो उसका आकार विशाल होने लगा ।  – फतहसिंह

According to an anecdote, a fisherman got a baby girl in the stomach of a fish. He brought her up. She was born out of the semen of king Uparichara Vasu. The story may be interpreted in the way that fisherman is symbolic of gross level. This gross level runs it’s livelihood on those fishes which are born in the divine waters of super mental level and by chance fall into the hands of this gross level. Fish may mean some type of consciousness born out of these divine waters. Sometimes, it happens that even some great power happen to descend into gross level. Satyavatee is symbolic of that great power. Satyavatee had foul smell of fish. Those divine waters which descend to gross level naturally become impure, having foul smell. – Fatah Singh

 

(ख) शन्तनु व सत्यवती की कथा के संदर्भ में, सत्यवती निषाद की पुत्री थी जिसे निषाद ने मत्स्य के पेट में से प्राप्त किया था । उपरिचर वसु का वीर्य मत्स्य के गर्भ में स्थापित होने से सत्यवती का जन्म हुआ था । इसका रहस्य यह है कि अन्नमय कोश के प्रतीक निषाद की जीविका विज्ञानमय कोश के दैवी आपः में उत्पन्न हुए मत्स्यों पर चला करती है जो उसके हाथ लग जाते हैं । मत्स्य का तात्पर्य दैवी आपः के सजीव तत्त्व से हो सकता है । इन मत्स्यों से कभी – कभी भारी शक्ति का अवतरण भी अन्नमय कोश में हो जाया करता है । सत्यवती उसी भारी शक्ति का प्रतीक है । सत्यवती नौका में बैठाकर पार लगाने वाली है । महर्षि पराशर से समागम होने पर सत्यवती व्यास( विस्तीर्ण व्यक्तित्व) को जन्म देती है । लेकिन यह व्यास व्यक्तित्व उत्पन्न होते ही अदृश्य हो जाता है – जंगल में चला जाता है । पराशर से समागम का लाभ सत्यवती को यह होता है कि अभी तक वह मत्स्य – गंधा थी । अन्नमय कोश में जो दैवी आपः अवतरित होते हैं, वह दुर्गन्ध युक्त हो ही जाते हैं । पराशर के वरदान स्वरूप वह पुण्यगन्धा हो जाती है । ऐसा पका हुआ अन्नमय कोश अपनी शक्ति उच्चतर कोशों(शन्तनु) को देने, उनसे विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में सक्षम हो जाता है । – फतहसिंह

There was a demon named Utkala who was catching fish in the hermitage of a sage. He was the son of a demon Hayagreeva. The sage cursed him to become a crane. This can be interpreted in the way that Utkala is symbolic of ascending nature. Then one gets higher powers which are symbolized by fishes. One can use these higher powers either for benefits of worldly things or for inner progress. One who uses these powers for worldly things, he is a demon.

 

(ग) गर्ग संहिता के अनुसार बकासुर पहले जन्म में हयग्रीव का पुत्र उत्कल था जो जाजलि ऋषि की पर्णशाला में मछली पकड रहा था । जाजलि ने उसे शाप दिया कि वह बगुले की तरह मछली पकड रहा है, अतः बक हो जा । कृष्ण तेरा उद्धार करेंगे । रहस्य – जब आसुरी चेतना(हयग्रीव) की ऊर्ध्वमुखी गति( उत्कल) होती है तो उसे शक्ति(मत्स्य) प्राप्त होती है । उसका उपयोग चेतना के व्यक्त रूप को पुष्ट करने(बक) के लिए होता है । फिर ऊर्ध्वमुखी साधना नहीं चलती । ऐसे बकासुर का वध कृष्ण करते हैं । दूसरे दृष्टिकोण से, मत्स्य का अर्थ सोम रस की ऊपर की ओर गति है । उस गति में जो बाधा डाले वह बकासुर है । मत्स्य को योग की ऋद्धि – सिद्धियां भी कह सकते हैं । बकासुर को तो इन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने की इच्छा है, ऊपर बढने की नहीं ।

Viraat was the king of Matsya. This indicates that Matsya/fish is connected with vast expanse.

 

(घ) राजा विराट मत्स्य देश का राजा है । अतः मत्स्य विराट से जुडा है । महाभारत शान्ति पर्व १३७ में प्रत्युत्पन्नमति, दीर्घसूत्री आदि मत्स्यों के नाम आते हैं ।

(ङ) पुराणों में प्रायः उल्लेख आते हैं कि निषाद आदि मत्स्य भक्षण करते हैं । ऐसा अनुमान है कि मत्स्य विज्ञानमय कोश की एक शक्ति है । उस शक्ति को भोगने का एक उपाय तो यह है कि मनोमय कोश से ऊपर उठकर विज्ञानमय कोश में पहुंचा जाए । दूसरा उपाय यह है कि विज्ञानमय कोश से जो शक्ति स्वाभाविक रूप से मनोमय कोश में क्षरित हो जाती है, उसी का उपयोग कर लिया जाए । निषाद ऐसा ही करते हैं । उनमें विज्ञानमय कोश तक पहुंचने की सामर्थ्य नहीं है ।

The Process of Attaining Self – Knowledge and Need of Union Between Self and Supreme Through the Story of Matsya Avtaara

–        Radha Gupta

In the eighth canto of Shrimad Bhaagawata Puraana, there is a symbolic story of Matsya Avataara which throws light on three points. First, the process of attaining self –knowledge; second, a sudden rise of obstacle in self knowledge and third, the only method to get rid of this obstacle.

Keeping these three points in mind, the story can be divided into two parts. First part is related with sleep of lord Brahmaa, manifestation of Vedas from his mouth and stealing of Vedas by demon Hayagreeva. Through this picture, the story tells us that every soul(human being) possesses knowledge but this knowledge does not manifest due to dominance of body consciousness. When this consciousness transforms in soul – consciousness and mind becomes silent, then this knowledge manifests. But the problem comes when pride also arises and swallows this knowledge. Then it is very necessary to unite one’s self with Supreme which takes a person into bliss.

Second part is related with the great king Satyavrata through which the process of attaining Self or self – knowledge and union with Supreme is described. The story tells us that  a new thought of being a soul arises in that person who leads a truthful life, accepts life as it is and is always careful towards the growth of his good qualities. Although this new and reolutionary thought makes him fearful in the beginning and a person wishes to drop it immediately, but this new thought of great value inspires him for it’s safety and as a result, that person puts it in his mind. This thought gradually expands which is symbolized as the expansion of a fish putting him in different sizes of vessels, ponds and sea etc.

The story indicate that the expansion of this thought is good, but not enough as the body consciousness is very strong and always ready to hit it. Therefore, this new thought of being a soul should be seated strongly in one’s intellect. Once strongly seated, knowledge manifests. This knowledge takes him towards divinity of mind, intellect and senses and a person now lives happily in the glowing light of this divinity.

The story also tells that self knowledge is very good but one more step is also to be taken in response of pride. As soon as knowledge manifests, pride follows it. Therefore, to get rid of this pride, it is very necessary to make a union with the Supreme Soul symbolized as the union of the boat with the horn of a big fish. This union can be made with the help of thoughts and feelings symbolized as the serpent named Vaasuki. First of all, a person visualizes Him or Supreme Soul through the eyes of mind and intellect and then expresses ones’ thoughts and feelings of gratitude towards Him.

At last, the story says that doing all this job described above, a person leading a truthful life earlier now transforms and possesses a magnificent personality named Vaivaswat Manu of new era.

 

मत्स्य अवतार कथा के माध्यम से आत्म – ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया एवं आत्मा – परमात्मा के योग की आवश्यकता का निरूपण

–        राधा गुप्ता

श्रीमद् भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध के २४वें अध्याय में मत्स्य अवतार कथा का वर्णन किया गया है । कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है –

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

पिछले कल्प के अन्त में ब्रह्मा जी के सो जाने के कारण भूलोक आदि सारे लोक जब प्रलय – समुद्र में डूब गए, तब वेद ब्रह्मा जी के मुख से निकल पडे और पास ही रहने वाले हयग्रीव नामक बली दैत्य ने उन्हें योगबल से चुरा लिया। भगवान् ने हयग्रीव की यह चेष्टा जान ली और मत्स्य अवतार ग्रहण करके हयग्रीव को मारकर वेद ब्रह्मा जी को लौटा दिए ।

उस समय द्रविड देश में सत्यव्रत नाम के एक उदार एवं भगवत्परायण राजर्षि केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे । एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण करते हुए उनकी अञ्जलि में एक छोटी सी मछली आ गई । राजा ने उस मछली को जल के साथ ही फिर से नदी में छोड दिया परन्तु जलजन्तुओं से रक्षा हेतु मछली द्वारा प्रार्थना किए जाने पर राजा ने मछली की रक्षा का मन ही मन संकल्प किया और मछली को कमण्डलु में रखकर आश्रम पर ले आए । एक ही रात में वह मछली कमण्डलु में इतनी बडी हो गई कि उसने राजा से सुखपूर्वक रहने के लिए बडे स्थान की प्रार्थना की । राजा ने मछली को कमण्डलु से निकालकर एक मटके में रख दिया परन्तु वहां भी वह मछली इतनी बढ गई कि उसके पुनः प्रार्थना करने पर राजा ने उसे उठाकर एक सरोवर में डाल दिया । सरोवर में भी मछली ने एक महामत्स्य का आकार धारण कर लिया और किसी अगाध सरोवर में रखने के लिए राजा से प्रार्थना की । राजा सत्यव्रत उस महामत्स्य को कईं अटूट जल वाले सरोवरों में ले गए, परन्तु जितना बडा सरोवर होता, उतना ही बडा आकार वह धारण कर लेता । अन्त में उन्होंने उस लीलामत्स्य को समुद्र में छोड दिया परन्तु समुद्र में छोडते समय मत्स्य भगवान् ने कहा कि हे राजन्, समुद्र में बडे – बडे बली मगर रहते हैं, वे मुझे खा जाएंगे, इसलिए मुझे समुद्र के जल में मत छोडिए ।

मत्स्य भगवान् की यह वाणी सुनकर सत्यव्रत महामुग्ध हो गए और उन्होंने जीवों पर अनुग्रह करने के लिए मत्स्य रूप धारण करने वाले भगवान् की स्तुति की । मत्स्य भगवान् ने सत्यव्रत को निर्देश दिया कि आज से सातवें दिन जब तीनों लोक प्रलयकाल की जलराशि में डूबने लगेंगे, तब मेरी ही प्रेरणा से तुम्हारे पास एक बडी नौका आएगी । उस समय तुम समस्त ओषधियों तथा छोटे – बडे बीजों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उस नौका पर आरूढ हो जाना और सप्तर्षियों की दिव्य ज्योति के सहारे बिना किसी विकलता के प्रलय – समुद्र में विचरण करना । तत्पश्चात् प्रचण्ड आँधी चलने के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी, तब इसी महामत्स्य रूप में मैं तुम्हारे पास आऊँगा और तुम वासुकि नाग के द्वारा अपनी नौका को मेरे शृङ्ग से बांध देना । जब तक ब्रह्मा जी की रात रहेगी, तब तक मैं नौका को खींचता हुआ समुद्र में विचरण करूंगा और तुम्हें परब्रह्म का उपदेश दूंगा ।

राजा सत्यव्रत को यह आदेश देकर मत्स्य भगवान् अन्तर्धान हो गए और राजा ने भी भगवान् के निर्देशानुसार वह समय आने पर सब कृत्य यथाविधि सम्पन्न किए । अन्त में मत्स्य भगवान् ने राजा को आत्म तत्त्व का उपदेश दिया । राजा सत्यव्रत ही मत्स्य भगवान् की कृपा से ज्ञान और विज्ञान से संयुक्त होकर नए कल्प में वैवस्वत मनु हो गए ।

कथा की प्रतीकात्मकता

१- कल्प का अन्त और प्रलय का समुद्र आत्म – चैतन्य की स्थिति को इंगित करते हैं । अपने मूल स्वरूप – आत्मस्वरूप से हटकर देहस्वरूप में रहना सृष्टि है तथा देहस्वरूप से हटकर पुनः अपने मूल स्वरूप में लौट जाना प्रलय है । सृष्टि परिधि है तो प्रलय केन्द्र ।

२- आत्म – चैतन्य की स्थिति में अर्थात् आत्म केन्द्रित हो जाने पर मन स्थिर और शान्त (अन्तर्मौन) हो जाता है । इसे ही ब्रह्मा जी का सोना कहकर इंगित किया गया है ।

३- मन के स्थिर और शान्त हो जाने पर अन्तर्निहित ज्ञान प्रकट हो जाता है । इसे निद्रायुक्त ब्रह्मा जी के मुख से वेद का गिरना कहकर इंगित किया गया है ।

४- आत्म स्मृति में स्थित होने पर देह स्मृति तिरोहित हो जाती है । इसे कथा में भूः, भुवादि लोकों का प्रलय समुद्र में डूबना कहा गया है ।

५- हयग्रीव असुर ज्ञान के अभिमान का सूचक है । हयग्रीव शब्द में हय शब्द हर(हृ धातु से निष्पन्न) का प्रच्छन्न रूप प्रतीत होता है, जिसका अर्थ है – हरण करना । ग्रीव शब्द ज्ञान अर्थ वाली गृ धातु से बना है । अतः हयग्रीव (हरग्रीव ) का अर्थ हुआ – ज्ञान का हरण करने वाला अर्थात् ज्ञानाभिमानी ।

६- सत्यव्रत (सत्य – व्रत) सत्य के प्रति निष्ठायुक्त जीवात्मा(मनुष्य ) का प्रतीक है ।

७- द्रविड शब्द मूल रूप में द्रविण है जिसका अर्थ है – धन, सम्पत्ति, सामर्थ्य, शक्ति आदि । द्रविड देश अद्भुत सामर्थ्य से युक्त मनुष्य शरीर को इंगित करता है, जिसमें सत्यनिष्ठ जीवात्मा(सत्यव्रत ) का वास है ।

८- कृतमाला (कृत – माला) नदी अपने ही कर्मों के फलस्वरूप घटित घटनाओं की शृङ्खला को इंगित करती है ।

९ – कृतमाला नदी में जल से तर्पण करने का अर्थ है – घटनाओं के सतत् प्रवाह से युक्त जीवन को सहज रूप से जीते हुए अपने गुणों का संवर्धन करना ।

१०- मत्स्य शब्द मद् और स्य नामक दो शब्दों के मेल से बना है । मद् एक सर्वनाम है जिसका अर्थ है – मैं से सम्बन्धित और स्यम् का अर्थ है – चिन्तन । अतः मत्स्य का अर्थ हुआ – मैं से सम्बन्धित चिन्तन अर्थात् मैं एक आत्मा हूं – ऐसा आत्मचिन्तन ।

११- जल में तर्पण करते हुए अञ्जलि में मत्स्य के आ जाने का अर्थ है – स्वगुणों को पुष्ट करते हुए आत्म – चिन्तन का जाग्रत हो जाना अर्थात् इस चिन्तन का जाग्रत हो जाना कि मैं देहमात्र नहीं, अपितु देह को चलाने वाला आत्मा हूं ।

१२- मत्स्य का शनैः – शनैः बडा हो जाना आत्म – चिन्तन के विस्तार को सूचित करता है। सर्वप्रथम मनुष्य इस ज्ञान से युक्त होता है कि मैं मात्र एक शरीर नहीं, अपितु शरीर को चलाने वाली एक शक्ति( आत्मा) हूं । इसी शक्ति से मैं मन के द्वारा संकल्पों की रचना करता हूं, बुद्धि के द्वारा निर्णय करता हूं, ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से देखता हूं, सुनता हूं, चखता हूं, सूंघता हूं, स्पर्श करता हूं तथा कर्मेन्द्रियों के द्वारा जाता हूं, बोलता हूं आदि । यही शक्ति मेरे स्थूल शरीर में कार्यरत सभी जीवनदायिनी प्रणालियों को चला रही है । मेरे शरीर का प्रत्येक कोष इसी शक्ति से अनुप्राणित है । जैसे मैं एक शुद्ध, शान्तस्वरूप आत्मा हूं, उसी प्रकार अन्य मनुष्य भी मेरे ही समान शुद्ध शान्तस्वरूप आत्मा ही हैं । इसी प्रकार के आत्म – चिन्तन के विस्तार को कथा में मत्स्य का कमण्डलु, मटके, सरोवर तथा समुद्र में रहना और बडा हो जाना कहकर इंगित किया गया है ।

१३- प्रबल देहचेतना और इस देह चेतना से सम्बन्ध रखने वाले संकल्पों को समुद्र में रहने वाले बलवान् मगरमच्छ कहा गया है जो प्राथमिक स्तर पर विकसित हुए आत्म – ज्ञान को खा जाने में समर्थ हैं ।

१४ – सातवां दिन बुद्धि नामक सातवें स्तर को इंगित करता है ।

१५ – नौका आत्म – ज्ञान का प्रतीक है । आत्म चैतन्य में स्थित होने पर अन्तर्निहित ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है । इसे ही कथा में भगवान् की प्रेरणा से नौका का स्वतः उपस्थित हो जाना कहा गया है ।

१६- सप्तर्षियों की दिव्य ज्योति का अर्थ है – पांचों ज्ञानेन्द्रियों, मन तथा बुद्धि का दिव्य हो जाना ।

१७- ओषधि शब्द ओषं – दधाति से बना है । ओषं का अर्थ है – उषा अर्थात् चेतना के जागरण से उत्पन्न तथा दधाति का अर्थ है – धारण करना । अतः ओषधि शब्द का अर्थ है – मनुष्य के प्रेम, करुणा आदि ऐसे गुण जो चेतना के जागरण से उत्पन्न हुए हैं और ओषधि के समान कल्याणकारी होते हैं ।

१८- बीज शब्द अवचेतन मन अर्थात् चित्त में पडे हुए संस्कारों को इंगित करता है ।

१९- मत्स्य शृङ्ग शब्द में मत्स्य का अर्थ है – आत्म चिन्तन और शृङ्ग का अर्थ है – चोटी, शिखर अर्थात् सर्वोच्च स्थान । अतः मत्स्य शृङ्ग शब्द का अर्थ हुआ – आत्म – चिन्तन का शिखर अर्थात् परमात्म चिन्तन ।

२०- वासुकि नाग विचार, संकल्प अथवा भाव का वाचक है । अतः वासुकि नाग रूपी रस्सी की सहायता से नौका को मत्स्य के शृङ्ग से बांधने का अर्थ है – संकल्प अथवा भाव के सहारे आत्मा को परमात्मा से संयुक्त कर देना ।

कथा का अभिप्राय

कथा के अभिप्राय को सुगमता से समझने के लिए उसे दो भागों में विभाजित कर लेना उपयोगी होगा ।

प्रथम भाग में ब्रह्मा जी की निद्रा, प्रलय – समुद्र में भूः आदि लोकों का डूबना, ब्रह्मा के मुख से वेद का निकल पडना तथा हयग्रीव असुर द्वारा वेद की चोरी आदि कथनों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि प्रत्येक आत्मा(मनुष्य) मूल रूप में ज्ञानस्वरूप ही है । देह – चेतना में अवस्थित हो जाने से मन के चञ्चल रहने के कारण उसका यह ज्ञानमय स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता । देह – चेतना के आत्म चेतना में रूपान्तरित होने पर मन के स्थिर एवं शान्त हो जाने से आत्मा का यह ज्ञानस्वरूप प्रकट हो जाता है । परन्तु ज्ञानस्वरूपता के प्राकट्य के साथ – साथ ज्ञान का अभिमान भी प्रकट हो जाता है, जो इस ज्ञानस्वरूपता का हरण कर लेता है । अतः ज्ञान के अभिमान से मुक्ति और ज्ञानस्वरूप में अवस्थित होने के लिए आत्म – चैतन्य (मनुष्य की चेतना) को एक अति विशिष्ट स्वरूप धारण करने की आवश्यकता है । उसे ही कथा में भगवान् का मत्स्य अवतार ग्रहण करना कहा गया है ।

द्वितीय भाग में सत्यव्रत की कथा के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य चेतना उस अति विशिष्ट स्वरूप को, जिसे मत्स्य भगवान् कहा गया है, कैसे प्राप्त करे ।

कथा में उस विशिष्ट स्वरूप को प्राप्त करने की जिस यात्रा का निर्देश किया गया है, उसके चार सोपान हैं ।

प्रथम सोपान के रूप में कथा संकेत करती है कि जो मनुष्य सत्य आचरण के प्रति निष्ठावान् है और अपने ही कर्मों के फलस्वरूप घटित घटनाओं के सतत् प्रवाह से युक्त जीवन को सहज भाव से जीता हुआ सतत् अपने गुणों का सम्वर्द्धन करता है – उसी के भीतर एक न एक दिन यह विचार उद्भूत होता है कि मैं शरीरमात्र नहीं हूं अपितु शरीर को चलाने वाला आत्मा हूं । इसे ही कथा में सत्यव्रत के हाथ में मत्स्य का आ जाना कहा गया है ।

अपनी सही पहचान के रूप में उद्भूत हुआ यह नूतन विचार पूर्व में संगृहीत हुई देह सम्बन्धी सभी मान्यताओं को छिन्न – भिन्न करने वाला होने के कारण प्रारम्भ में मनुष्य मन को उद्वेलित करता है । इसीलिए मनुष्य इस नूतन आत्म – विचार को कि मैं आत्मा हूं और मेरे समान सभी आत्मस्वरूप हैं, छोड देना चाहता है । परन्तु एक बार उद्भूत हुआ यह नूतन विचार ही मनुष्य को अन्ततः उसके वास्तविक स्वरूप में अवस्थित कराने वाला होने से अत्यन्त कल्याणकारी होता है । अतः मनुष्य चाहते हुए भी उस आत्म – चिन्तन को छोड नहीं पाता और उसकी यह आत्म – चिन्तना शनैः शनैः विस्तार को प्राप्त होने लगती है । अब शीघ्र ही मनुष्य को यह ज्ञात हो जाता है कि मैं एक आत्मा हूं, एक शक्ति हूं जो इस देह रूपी यन्त्र को चला रही है अर्थात् यही शक्ति मन – बुद्धि के माध्यम से अनेक प्रकार के संकल्पों को उत्पन्न कर रही है, यही पांचों ज्ञानेन्द्रियों तथा पांचों कर्मेन्द्रियों के माध्यम से दर्शन, श्रवण प्रभृति भिन्न – भिन्न कार्यों को करा रही है तथा यही पाञ्चभौतिक शरीर की आन्तरिक संरचना में कार्यरत सभी प्रणालियों को गति दे रही है । इसी तथ्य को कथा में मत्स्य का निरन्तर बडा होना कहकर निरूपित किया गया है ।

आत्म – चिन्तना का यह विस्तार अर्थात् आत्मा और देह का परस्पर योग रूप यह ज्ञान महत्त्वपूर्ण तो है, परन्तु पर्याप्त नहीं, क्योंकि प्रबल देह चेतना और उससे सम्बन्ध रखने वाले विचार मगरमच्छों की भांति किसी भी समय इस ज्ञान को निगल जाने के लिए तैयार रहते हैं, इसलिए द्वितीय सोपान के रूप में कथा संकेत करती है कि मैं आत्मा हूं और सभी मेरे समान आत्मस्वरूप हैं – यह आत्म – चिन्तना बुद्धि के स्तर पर इतनी सुदृढता से स्थित होना आवश्यक है कि सतत् आत्म – स्मृति में देह – स्मृति शिथिल हो जाए । इसे ही कथा में प्रलय – समुद्र में भूः भुवादि लोकों का डूब जाना कहकर इंगित किया गया है ।

बुद्धि के स्तर पर निर्मित यह सुदृढ आत्म – स्मृति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यही आत्म – स्मृति मनुष्य को गुह्य ज्ञान की नौका पर आरूढ कराती है अर्थात् सुदृढ आत्म – स्मृति के फलस्वरूप ही मनुष्य का अन्तर्निहित ज्ञान प्रकट हो पाता है । यही नहीं, बुद्धि में स्थित इस सुदृढ आत्म – स्मृति के फलस्वरूप मनुष्य की चेतना का जो जागरण होता है, उससे उसका मन, उसकी बुद्धि तथा पांचों ज्ञानेन्द्रियों (सप्तर्षि) दिव्यता को धारण कर लेते हैं और फिर उस दिव्यता के आलोक में मनुष्य अपने श्रेष्ठ गुणों(ओषधि ) तथा बीज(संस्कार) रूप में विद्यमान दोषों को धारण करता हुआ सुखपूर्वक विहार करने लगता है ।

आत्म – ज्ञान रूपी नौका पर आरूढ होना और दिव्यता के आलोक में रहकर सुखपूर्वक विहार करना अत्युत्तम है परन्तु यह भी पर्याप्त नहीं क्योंकि आत्म – ज्ञान के साथ ही उत्पन्न हुए अहंकार की प्रबल आंधी से आत्म – ज्ञान रूपी यह नौका भी डगमगाने लगती है । इसलिए तृतीय सोपान के रूप में कथा संकेत करती है कि आत्म – ज्ञान की इस नौका को परमात्म – चिन्तन (मत्स्य शृङ्ग) से जोड देना अनिवार्य है । परमात्म – चिन्तन से जुडकर मनुष्य आत्म – ज्ञान विषयक अहंकार से मुक्त हो जाता है और तब सर्वत्र व्याप्त आत्म – चैतन्य रूपी प्रलय – समुद्र में विहार करना अत्यन्त आनन्दकारी हो जाता है ।

परन्तु आत्म – ज्ञान रूपी नौका को अर्थात् आत्मा रूप स्वयं को परमात्मा से कैसे जोडा जाए । इस प्रश्न का समाधान करते हुए चतुर्थ सोपान के रूप में कथा संकेत करती है कि आत्मा रूप स्वयं को परमात्म – चिन्तन से जोडने के लिए विचार तथा भाव रूपी रस्सी की आवश्यकता होती है जिसे कथा में वासुकि नाग कहकर संकेतित किया गया है अर्थात् मनुष्य ने अपने विचारों तथा भावों में परमात्मा के जिस स्वरूप को स्थापित कर रखा है, उसी स्वरूप का अपने मन – बुद्धि की आंखों से साक्षात्कार करते हुए ज्ञान – प्राप्ति का समस्त श्रेय उसी के चरणों में निवेदित कर देना चाहिए ।

इस प्रकार जब चेतना उपर्युक्त वर्णित विशिष्ट मत्स्य स्वरूप से समन्वित हो जाती है, तब मनुष्य अत्यन्त ज्योतिर्मय, प्रभावी व्यक्तित्व को धारण कर लेता है जिसे कथा में राजर्षि सत्यव्रत का ही नए कल्प में वैवस्वत मनु बन जाना कहा गया है ।

According to Lakshminaaraayana Samhitaa, fish represent the faculties which are able to receive  finer parts of elements like sound, touch, form, taste and smell. Our senses are also able to receive the finer parts, so can these be called fish? No, these are called crocodile or alligator, which eat fish. An essential quality of a fish is that it should receive the finer parts of elements and save it in some way in a more fine form. In ordinary state, our senses taste the finer parts and then soon forget about it. We have to revive the taste after some time. This should not be the case with fish. Our taste experience will be preserved in seed form and whenever we want, we can revive the experience from there.

There is another aspect of fish. According to Dr. Fatah Singh, when one descends from trance, the sense objects return gradually. First, there is feeling of sound only. Then sound and touch will be sensed. On the other hand, when one ascends towards trance, then one has to eat out sense objects gradually. If one is able to eat out the sense objects, then such type of senses can be called fish.

 

There is a hymn in Rigveda where fish pray to suns. What is the content of prayers, is not yet understood. But one can understand what is the need for praying for suns. Suns represent quick path of progress in penances. On the other hand, fire(?) represents slow path of progress. So, fish want a jump from slow to fast progress. There is an other probability that the suns are fishermen.

Mackay : Further Excavations at Mohenjodaro

Daniel Salas has interpreted fish and alligator as grah(fish) and graaha(alligator), eclipse at full moon, while Dr. S. Kalyana Ramana interprets this as iron and ironsmith.

 

मत्स्य का वैदिक स्वरूप

लक्ष्मीनारायण संहिता ३.१७५ में मत्स्यों को तन्मात्राहार कहा गया है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को तन्मात्राएं कहा जाता है । यह इन्द्रियों के विषय हैं । इन्द्रियां इन विषयों का भोग करती हैं । अतः इन्द्रियों को मत्स्य कहा जा सकता है क्योंकि तन्मात्राएं इनका आहार हैं। लेकिन लक्ष्मीनारायण संहिता में इन्द्रियों को झष या मकर कहा गया है, मत्स्यों को खाने वाली । डा. फतहसिंह के अनुसार समाधि से व्युत्थान की स्थिति में शब्द, स्पर्श आदि तन्मात्राओं का उदय क्रमिक रूप से होता है । पहले केवल शब्द का अनुभव होता है । उसे जैन सम्प्रदाय में एकसंज्ञी जीव कहा जाता है । फिर शब्द और स्पर्श का । यह द्वि संज्ञी जीव हुआ । इस प्रकार आगे संज्ञान बढता जाता है। समाधि से व्युत्थान से उल्टी स्थिति समाधि की ओर प्रस्थान होगी । तब अग्नि, वायु, आकाश आदि एक – दूसरे की तन्मात्राओं का भक्षण करते हैं और अन्त में निर्विकल्प समाधि की स्थिति शेष रह जाती है । भूमि की तन्मात्रा गन्ध को आपः अपने में लीन कर लेता है। इससे भूमि नष्ट हो जाती है। आपः की तन्मात्रा रस को अग्नि अपने में लीन कर लेता है । इससे आपः नष्ट हो जाता है। अग्नि की तन्मात्रा तेज को वायु, वायु की तन्मात्रा स्पर्श को आकाश और आकाश की तन्मात्रा शब्द को भूतादि? ग्रस लेता है। पुराणों में इस स्थिति का वर्णन प्रलय के अन्तर्गत किया गया है । इससे निष्कर्ष निकलता है कि जब भूमि, आपः, अग्नि, वायु, आकाश इस योग्य बन जाएं कि तन्मात्राओं का भक्षण करने लगें, उस स्थिति में इन्हें मत्स्य कहा जा सकता है(आचार्य श्री रजनीश ने कुण्डलिनी और सात शरीर नामक व्याख्यानमाला में यह प्रतिपादित किया है कि अन्नमय कोश इसलिए काम कर रहा है क्योंकि प्राणमय कोश उसको शक्ति प्रदान कर रहा है। जब भय आदि के कारण प्राणमय कोश अपनी शक्ति का उपसंहार कर लेता है तो पैर लडखडाने लगते हैं। यही तथ्य ऊपर के कोशों पर भी लागू होता है। इस तर्क के अनुसार हमारे सात कोश या शरीर मत्स्य हुए।)।

शतपथ ब्राह्मण १.८.१.१ में मनु द्वारा आचमन या अवनेजन करते समय उदक में एक छोटे से मत्स्य का प्रकट होना, मत्स्य द्वारा विशाल और विशालतर रूप धारण करते करते झष या मकर बन जाना और औघ(जल प्रलय) में मनु की नौका को उत्तर गिरि पर पाश से बांध देने का आख्यान है जिसकी पुनरावृत्ति पुराणों में सार्वत्रिक रूप से हुई है । फिर जब ओघ कम हुआ तो मनु की नौका भी उसके साथ – साथ नीचे उतरने लगी । इस कथा में ओघ(ओ – घ, ओंकार की घनता की स्थिति) को समाधि की स्थिति समझा जा सकता है । समाधि अवस्था प्राप्त करने के लिए तन्मात्राओं का भक्षण आवश्यक है। शतपथ ब्राह्मण के आख्यान में जिस उत्तरगिरि की बात कही गई है, वह डा. फतहसिंह का विज्ञानमय कोश हो सकता है । उसके पश्चात् समाधि अवस्था से व्युत्थान की आवश्यकता होती है ।

शतपथ ब्राह्मण का उपरोक्त आख्यान याग में इडाकर्म के बीच में रखा गया है और इस आख्यान के अन्त में कहा गया है कि जब प्रलय समाप्त हो गई तो मनु के समक्ष प्रजा उत्पन्न करने का संकट पैदा हो गया। मनु ने अन्नाद्यों से, सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थों से यज्ञ करना आरम्भ किया। तब संवत्सर के अन्त में मनु के समक्ष इडा नामक स्त्री के प्रकट होने का आख्यान आरम्भ हो जाता है। इडा को पाकयज्ञिया कहा गया है, अर्थात् उसे यज्ञों द्वारा पकाना है। वह कच्ची अवस्था में है। आजकल की भाषा में इडा को अचेतन मन कहा गया है। हमारी इन्द्रियां जिस भी विषय का ग्रहण करती हैं, उसका बीज अचेतन मन में चला जाता है। यदि विषयों का ग्रहण मत्स्यों द्वारा किया गया होता तो उसके बीज की स्थापना विज्ञानमय कोश में हुई होती। अतः जब पुराणों की कथाओं में मनु द्वारा अपनी नौका में सारे बीजों के संग्रह का उल्लेख आता है, तब यह ध्यान देने योग्य है कि यह बीज अचेतन मन के हैं या विज्ञानमय कोश के। बीज जितना कमजोर होगा, इडा भी उतनी ही कच्ची रह जाएगी।

ऋग्वेद ८.६७ सूक्त मत्स्यः साम्मदः , मैत्रावरुणिर्मान्यः या बहवो मत्स्याः जालनद्धाः ऋषियों का है तथा इस सूक्त के देवता आदित्याः हैं । सूक्त का छन्द गायत्री है । डा. फतहसिंह के अनुसार आदित्य का अर्थ होता है आदान करने वाला(आदित्य शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है) । यह आदान करके उसके सूक्ष्म रूप को विज्ञानमय कोश में डालते जाते हैं। इन्द्रियां विषयों का आदान करती हैं, अतः यह भी आदित्य होनी चाहिएं। भागवत पुराण का कथन है कि ऊष्माणं इन्द्रियाण्याहुः अन्तस्था बलमात्मनः । इस श्लोक में ऊष्माण व अन्तस्थ से तात्पर्य वर्णमाला के कुछ अक्षरों से है । य, र, ल, व को अन्तस्थ तथा श, ष, स को ऊष्माण कहते हैं । लेकिन इसका एक अर्थ इस प्रकार भी किया जा सकता है कि इन्द्रियां जब तन्मात्राओं का ग्रहण करती हैं तो ऊष्मा का जनन होता है और यह ऊर्जा व्यर्थ जाती है । अतः यह अपेक्षित है कि इन्द्रिय रूपी आदित्यों द्वारा तन्मात्राओं का ग्रहण इस प्रकार हो कि कोई ऊर्जा व्यर्थ न जाए । प्रायः होता यह है कि कोई इन्द्रिय जब रस का आस्वादन करती है तो थोडी ही देर पश्चात् उस रस को भूल जाती है । हमें फिर से उस रस को ग्रहण करके अपने अनुभव की पुनरावृत्ति करनी होती है । यदि इन्द्रिय मत्स्य बन जाए तो विषयों का, रस का आस्वादन एक बार हो जाने पर उसका बीज विज्ञानमय कोश में सुरक्षित रहेगा, जब चाहे वहां से उस रस का पुनः आस्वादन किया जा सकता है।

छान्दोग्य उपनिषद १.४.३ में एक छोटा सा आख्यान है कि देवों ने मृत्यु से बचने के लिए ऋक, यजु व साम में प्रवेश किया तथा अपने को छन्दों से आच्छादित कर लिया। लेकिन जैसे उदक में मत्स्य दिखाई दे जाता है, वैसे ही मृत्यु ने उन्हें वहां देख लिया। तब देवों ने ऋक्, यजु व साम से ऊपर उठ कर स्वर में प्रवेश किया और अमृतत्व को प्राप्त कर लिया । यह स्वर ओम् है। इस आख्यान से संकेत मिलता है कि मत्स्य के परितः जो उदक है, वह ऋक्, यजु व साम का प्रतीक है। इस स्थिति में मत्स्य के लिए मृत्यु से छुटकारा नहीं है। यह स्थिति विज्ञानमय कोश की ही कही जा सकती है। यह आश्चर्यजनक है कि डा. फतहसिंह ने मत्स्य की प्रकृति का सही अनुमान लगाया है। यह उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार का उदक होगा, उसमें उसी प्रकार का मत्स्य होगा। महाभारत में दुःख रूपी उदक में रजो मीन का उल्लेख है। ऋग्वेद के मत्स्य सूक्त के देवता आदित्य के संदर्भ में एक अनुमान यह लगाया जा सकता है कि उदक को देने वाले, उसे शुद्ध करने वाले आदित्य ही हैं। भौतिक जगत का सूर्य पहले अपनी रश्मियों द्वारा उदक का आदान करता है जिससे मेघों की सृष्टि होती है। फिर यह मेघ द्रवित होकर वर्षण करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि सूर्य जिस चन्द्रमा का भक्षण करता है, उसको वृष्टि के रूप में पृथिवी पर भेजता है। एक दूसरी संभावना यह है कि मत्स्य सूक्त के देवता आदित्य भौतिक जगत के कैवर्त्त या धीवर ही हैं जो मत्स्य का हनन करते हैं। मत्स्य उन्हीं कैवर्त्तों की स्तुति कर रहे हैं। सूक्त में इन आदित्यों को क्षत्रिय कहा गया है जो पाप का हनन करते हैं।

 

ऐसा अनुमान है कि उदक स्थिति की प्राप्ति कठिन साधना द्वारा हो सकती है। उदक की स्थिति में शरीर में जड अवस्था में पडे रस चलायमान हो जाते हैं। फिर यह द्रवित रस मद की स्थिति उत्पन्न करते हैं । इस मद का नियन्त्रण करना होता है, जैसा कि सम्मद – पुत्र मत्स्य से संकेत मिलता है। इससे अगली स्थिति मत्स्य की हो सकती है।

मत्स्य सूक्त के देवता आदित्य क्यों हैं, इस पर एक और दृष्टि से भी विचार किया जा सकता है । सोमयाग के कृत्य को तीन सवनों में विभाजित किया गया है – प्रातःसवन, माध्यन्दिन सवन और तृतीय सवन। प्रातःसवन के देवता वसु, माध्यन्दिन के रुद्र और तृतीय सवन के देवता आदित्य होते हैं। माध्यन्दिन सवन निष्केवल्य समाधि की स्थिति होती है । तृतीय सवन समाधि से व्युत्थान की स्थिति होती है । इस सवन में मर्त्य स्तर को अमृत का आस्वादन कराने का प्रयास किया जाता है जिससे वह भी देवों की तरह अमर हो सके। इस सवन के देवताओं के रूप में आदित्यों का चयन क्यों किया गया है, इस संदर्भ में आख्यानों के आधार पर अनुमान ही लगाया जा सकता है । आदित्यों का यज्ञ एक दिवसीय होता है जिसे अद्य सुत्या कहते हैं । अंगिरसों का यज्ञ दो या अधिक दिवसीय होता है जिसे श्वः सुत्या कहते हैं । देवों का यज्ञ भी अद्य सुत्या वाला होता है – अभी, इसी समय। अंगिरसों का यज्ञ भविष्य पर, श्वः पर टलता रहता है । अंगिरसों की साधना में प्रगति धीरे – धीरे होती है, आदित्यों की तीव्र गति से । अतः जब ऋग्वेद के सूक्त में मत्स्य आदित्यों की स्तुति कर रहे हैं, तो उससे तात्पर्य यही हो सकता है कि मत्स्य मन्द गति की प्रगति से तीव्र गति की प्रगति पर पहुंचना चाहते हैं। क्या यह सूक्त तृतीय सवन जैसी स्थिति के लिए, समाधि से व्युत्थान की स्थिति के लिए अभिप्रेत है, यह अन्वेषणीय है ।

पद्म पुराण आदि में मत्स्यावतार द्वारा शंख असुर को मारने के उल्लेख आते हैं । शंखासुर ने ब्रह्मा के वेदों का हरण कर लिया था। पद्म पुराण में ही मत्स्य अवतार द्वारा मकर दैत्य के वध की कथा भी आती है। जब मत्स्य द्वारा शंख के वध का उल्लेख आता है तो वहां शंख से तात्पर्य सांख्य से लिया जा सकता है। डा. फतहसिंह का कहना है कि दो स्थितियां हैं – एक सांख्य की, एक योग की। जब हम किसी घटना के, वस्तु के टुकडे – टुकडे करके देखते हैं तो वह सांख्य की स्थिति है। जब हम एकीकृत रूप देखते हैं तो वह योग है। मत्स्य सूक्त के देवता आदित्य और अदिति हैं। अदिति दिति अर्थात् खण्डित अवस्था से उल्टी स्थिति, अखण्डित स्थिति है। अतः यह कहा जा सकता है कि मत्स्यों द्वारा आदित्य व अदिति का स्तवन खण्डित स्थिति से अखण्डित स्थिति को प्रस्थान करने हेतु है। जब मत्स्यावतार द्वारा मारे गए दैत्य को मकर कहा जाता है तो उससे तात्पर्य इन्द्रियां हो सकती हैं।

ऐसा अनुमान है कि सोमयाग के तृतीय सवन का एक लघु रूप प्रवर्ग्य कृत्य में उपसद इष्टि होती है । उपसद इष्टि के बारे में कहा गया है कि यदि प्रवर्ग्य शिर है तो उपसद ग्रीवा है जो इस शिर को धारण करती है। ग्रीवा शरीर में धड से जुडी है। शिर में रक्त का प्रवाह तीव्र है जबकि धड में मन्द। यही कारण है कि शीर्ष भाग शीत से कम प्रभावित होता है, धड भाग में शीत अधिक प्रतीत होता है। इस इष्टि के तीन मन्त्र मह्त्त्वपूर्ण हैं – या ते अग्ने अयः शया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा – – – , या ते अग्ने रजःशया तनूर् – – – – -, या ते अग्ने हरःशया तनूर् – – -। इन तीन मन्त्रों का उच्चारण क्रम से तीन उपसद इष्टियों में किया जाता है । पुराणों में इसका स्वरूप यह है कि एक असुर के अन्तरिक्ष में तीन पुर थे और शिव ने अपने धनुष के एक ही बाण से तीनों को धराशायी कर दिया । इन तीन पुरों के असुरत्व को नष्ट करने के लिए यह आवश्यक था कि केवल एक ही बाण से यह नष्ट हो सकता था। इस आख्यान से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि तीन पुरों की भांति ही मत्स्यों के तीन प्रकार हो सकते हैं जिनका उल्लेख महाभारत, कथासरित्सागर आदि की कथाओं में अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति, दीर्घसूत्री आदि कह कर किया गया है । ऋग्वेद के मत्स्य सूक्त में भी तीन प्रकार के ऋषि हैं । क्या यह यही तीनों स्थितियां हैं, यह अन्वेषणीय है ।

महाभारत में राजा विराट मत्स्य देश का राजा है(विराट राजा को मरुद्गणों का अंश कहा गया है) । इस देश में पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष का समय छद्म रूप में रहकर बिताया था । तब युधिष्ठिर ने अपना नाम कंक(कं सुखं करोति इति) रखा था जो राजा विराट का मनोरंजन द्यूत द्वारा किया करता था। विराट स्वरूप वाली प्रकृति में द्यूत के लिए कोई स्थान नहीं है, सब कार्य अपने – अपने कारणों से जुडे होते हैं । लेकिन महाभारतकार ने सुन्दर ढंग से कह दिया है कि यद्यपि वहां द्यूत के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर भी द्यूत से विराट का मनोरंजन होता है, वैसे ही जैसे इस सृष्टि से ईश्वर का मनोरंजन होता है। कङ्क शब्द की निरुक्ति ककि धातु(गति अर्थ में) के आधार पर की जा सकती है। काशकृत्स्न धातु व्याख्यानम्(युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा अनुवादित) में कंक का एक अर्थ जटायु किया गया है। लगता है कि यह कोई त्रुटित प्रकार की गति है जो द्यूत के लिए उपयुक्त हो सकती है। भीम ने बल्लव नाम से सूद(पाकशाला) का काम किया था। यहां पाक से तात्पर्य इडा अर्थात् अचेतन मन के पाक से हो सकता है। अर्जुन बृहन्नला नाम से नपुंसक बनकर राजा के अन्तःपुर का रक्षक बना था। अभिधान राजेन्द्र कोश में मच्छ शब्द के वर्णन में मत्स्यों के एक प्रकार में नपुंसक प्रकार भी है। व्यावहारिक रूप में हमें यह सोचना होगा कि अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुखी बनाने के लिए, मत्स्य बनाने के लिए कौन सी साधना अपेक्षित है। उन साधनाओं में नपुंसक बनना एक हो सकता है। सारी काम शक्ति जब ऊर्ध्वमुखी हो जाएगी, तभी नपुंसक बना जा सकता है। नकुल ग्रन्थिक नाम से अश्वों का रक्षक बना था और सहदेव तन्तिपाल नाम से गायों का रक्षक बना था। नकुल की निरुक्ति इस प्रकार की गई है कि – न सदृशं रूपं कुले यस्य, अर्थात् कुल में उसके जैसे रूप वाला कोई नहीं है। रूप की पराकाष्ठा शुद्ध रूप, नक्षत्रों का रूप धारण करने में होती है। पृथिवी पर जितने रूप हैं, उन्हें चित्र रूप कहा जाता है। यदि नकुल रूप का प्रतीक है तो सहदेव नाम का प्रतीक हो सकता है। नाम की पराकाष्ठा इसमें है कि वह सोए हुए प्राणों को कितना जगा सकता है( स्कन्द पुराण में शतरुद्रिय के संदर्भ में उल्लेख आता है कि मत्स्यों ने शास्त्र लिङ्ग की आराधना वृषाकपि नाम से की। व्याख्या अपेक्षित है)  । द्रौपदी सैरन्ध्री बनी थी। यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि पुराणों में क्षुद्र मत्स्य द्वारा भक्तों को विराट रूप में दर्शन देने के उल्लेख आते हैं, लेकिन मत्स्य का विराट रूप कौन सा है, इसका वर्णन संभवतः नहीं है । विराट रूप की कल्पना महाभारत के राजा विराट के आधार पर ही की जा सकती है।

शतपथ ब्राह्मण १३.५.४.९ में अश्वमेध के संदर्भ में मात्स्य राजा द्वैतवन का कथन है जिसके लिए निम्नलिखित गाथा का उल्लेख है – चतुर्दश द्वैतवनो राजा संग्रामजिद्धयान्। इंद्राय वृत्रघ्नेऽबध्नात् तस्मात् द्वैतवनं सरः। इस संदर्भ में द्वैतवन विज्ञानमय कोश ही हो सकता है । कुण्डलिनी और सात शरीर व्याख्यानमाला में सात कोशों के संदर्भ में श्री रजनीश ने हृदय के अनाहत चक्र की स्थिति को द्वैत प्रकार की कहा है। यहां विभिन्न चेतनाएं परस्पर मिलकर एक नहीं बनती। उनमें भिन्नता रह जाती है। इससे ऊपर विशुद्धि चक्र में पहुंचने पर एक चेतना का दूसरी चेतना से एकाकार होना संभव हो जाता है और इस प्रकार एक दूसरे के मन की बात जानी जा सकती है। जैमिनीय ब्राह्मण २.२८४ में मात्स्य राजा तक्षक भागेरथि का प्रसंग है। ब्रह्माण्ड पुराण में मत्स्यराज मङ्गल का प्रसंग है जिसका वध परशुराम ने किया।

मार्कण्डेय पुराण में अकृतज्ञ व कृतघ्न को मत्स्य योनि प्राप्ति का उल्लेख है। जैसा कि धनुष आदि शब्दों की टिप्पणियों में व्याख्या की जा चुकी है, कृत द्यूत के उन अक्षों को कहते हैं जिन्हें जीत लिया गया हो। पकाए हुए, संस्कृत भोजन को भी कृत कहते हैं। जो चेतना कृत स्थिति तक न पहुंची हो, जहां अभी द्यूत की हार – जीत विद्यमान हो, वह कृतघ्न हो सकता है। मार्कण्डेय पुराण का यह उल्लेख परोक्ष रूप में मत्स्य की महत्त्वपूर्ण निरुक्ति है। डा. फतहसिंह के अनुसार मत्स्य विज्ञानमय कोश की चेतना की स्थिति है जो एक ओर अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोशों से बनी मानुषी त्रिलोकी से जुडा रहता है तो दूसरी ओर आनन्दमय, —- और विज्ञानमय कोशों की दैवी त्रिलोकी से जुडा रहता है। स्कन्द पुराण में बहते जल में बाधा डालने वाले को मत्स्य योनि प्राप्ति का उल्लेख है। इस कथन की व्याख्या भी उपरोक्त प्रकार से की जा सकती है। एक वेद मन्त्र में कृत की धारा का उल्लेख आता है।

निरुक्तकार यास्काचार्य द्वारा मत्स्य सूक्त की निम्नलिखित ऋचा का चयन व्याख्या हेतु किया गया है –

जीवान् नो अभि धेतनाऽऽदित्यासः पुरा हथात् । कद्ध स्थ हवनश्रुतः।। – ऋ.८.६७.५

इस ऋचा की व्याख्या में निरुक्तकार का कहना है कि – मत्स्या मधा उदके स्यन्दन्ते, माद्यन्तेऽन्योन्यं भक्षणायेति वा ।-(निरुक्त ६.२७)

 

सूक्त के एक ऋषि के रूप में सम्मद – पुत्र मत्स्य का उल्लेख है । मत्स्य की निरुक्ति मद धातु के आधार पर की गई है । यदि मुक्त रूप से विचार करें तो मत्स्य का अर्थ हो सकता है – जिसका मादन किया जा सकता है, अथवा जिसमें मति का प्रवेश कराया जा सकता है । यहां प्रश्न उठता है कि वह क्या तत्त्व है जिसका मादन किया जा सकता है अथवा जिसमें मति का प्रवेश कराया जा सकता है ।  यास्क ने मत् का अर्थ मधु और स्य का अर्थ स्यन्दन किया है । मत्स्य शब्द ऋग्वेद की बहुत कम ऋचाओं में प्रकट हुआ है । अथवा यह भी कह सकते हैं कि पूरे वैदिक साहित्य में मत्स्य शब्द उतना प्रकट नहीं हुआ है जितना अपेक्षित था । अतः केवल मत्स्य शब्द के आधार पर इस शब्द के अर्थ की पुष्टि कठिन हो जाती है । लेकिन वेद के विद्वानों का मानना है कि संहिता का अर्थ होता है जो अपने आप में पूर्ण हो, जिसमें उसके सभी रहस्यों को खोजा जा सके । शब्द के हल के लिए मत्सि, मत्स्व आदि शब्दों का सहारा लिया जा सकता है जो ऋग्वेद की ऋचाओं में प्रकट हुए हैं ।

शतपथ ब्राह्मण १३.४.३.१२ में अश्वमेध में पारिप्लव आख्यान के संदर्भ में कथन है कि पारिप्लव कृत्य के १० दिनों में से ८वें दिन जिस वाक्य का उच्चारण किया जाता है, वह यह है –

मत्स्यः साम्मदो राजेत्याह । तस्योदकेचरा विशः। त इम आसत इति । मत्स्याश्च मत्स्यहनश्चोपसमेता भवन्ति। तानुपदिशति । इतिहासो वेदः सोऽयमिति। कंचिदितिहासमाचक्षीत। एवमेवाध्वर्युः संप्रेष्यति। न प्रक्रमान् जुहोति ।

तैत्तिरीय संहिता २.६.६.१ में एक आख्यान है कि अग्नि के तीन बडे भाई थे जो देवों के लिए हवि का वहन करते – करते मर गए। तब अग्नि डर कर आपः में जाकर छिप गया । तब मत्स्य ने देवताओं को अग्नि के छिपने का स्थान बता दिया । इस पर अग्नि ने मत्स्य को शाप दिया कि – धियाधिया त्वा बध्यासुर्यो मा प्रावोच इति तस्मान्मत्स्यं धियाधिया घ्नन्ति शप्तो हि । इस वाक्य का सायणाचार्य द्वारा भाष्य इस प्रकार किया गया है कि जालधारी कैवर्तों का जब जब मारने को जी करेगा, रात्रि हो या दिन, तब – तब वे वध करेंगे । लक्ष्मीनारायण संहिता में इस आख्यान की पुनरावृत्ति की गई है (पुराणों में मत्स्य के स्थान पर भेक या मण्डूक का उल्लेख आया है)। साथ ही साथ यह भी जोड दिया गया है कि देवों ने मत्स्य को उत्शाप दिया कि तुम्हारी शतशः सहस्रशः वंश वृद्धि होगी । तैत्तिरीय संहिता के कथन में धियाधिया शब्द ध्यान देने योग्य है । मत्स्य शब्द में भी कहीं मति छिपी होने का संदेह है । ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि जब साधना में मद की, हर्ष की, अत्यन्त आनन्द की स्थिति उत्पन्न होती है तो उस मद पर नियन्त्रण करना आवश्यक है । उस मद का बुद्धि में, धी में, मति में अवशोषण करना पडता है । यह मत्स्यों को मारना हो सकता है । जब यास्काचार्य मत्स्य की निरुक्ति मधु या उदक में स्यन्दन करने वाले के रूप में करते हैं तो उसका भी अर्थ यह लिया जा सकता है कि जो मद उत्पन्न हुआ है, उसका स्रवण ऊपर के कोश से निचले कोशों में होना चाहिए । शतपथ ब्राह्मण के कथन में इतिहास वेद का उल्लेख मह्त्त्वपूर्ण है । इतिहास का अर्थ होता है कारण – कार्य का ज्ञान, पूर्वापर घटनाओं के घटित होने के कारण का ज्ञान । क्या मद पर नियन्त्रण कर लेने पर इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है, यह अन्वेषणीय है । मत्स्य को वरदान रूप में वंश के शतशः सहस्रशः वृद्धि होने का उल्लेख है। वैदिक साहित्य में दशतः का अर्थ ऋग्वेद, शतशः का अर्थ यजुर्वेद तथा सहस्रशः का सामवेद लिया जाता है।

शतपथ ब्राह्मण में जो वैवस्वत मनु और मत्स्य का आख्यान प्रकट हुआ है, उसके अन्त में मनु के समक्ष इडा का प्राकट्य होता है।

 

मत्स्य सूक्त की ऋचा जीवान् नो अभि धेतनाऽऽदित्यासः पुरा हथात् । कद्ध स्थ हवनश्रुतः में मत्स्य मरने से पहले जीवदान की जो मांग कर रहे हैं, उससे क्या तात्पर्य है, यह अन्वेषणीय है ।

 

डेनियल सलास ने पूर्णिमा पर ग्रहण के संदर्भ में मकर को राहु और मत्स्य को केतु कहा है और इसको सूर्यग्रहण आदि की प्रक्रिया से जोडा है । डा. कल्याणरमण मत्स्य को लौह और ग्राह को लौहकार बताते हैं ।

मत्स्य सूक्त(ऋग्वेद ८.६७)

त्यान्नु क्ष॒त्रियाँ अव आदि॒त्यान्याचिषामहे। सु॒मृ॒ळी॒काँ अ॒भिष्टये।।

मि॒त्रो नो॒ अत्यंह॒तिं वरुणः पर्षदर्य॒मा। आ॒दि॒त्यासो॒ यथा वि॒दुः।।

तेषां॒ हि चि॒त्रमु॒क्थ्यं१ वरूथ॒मस्ति दा॒शुषे। आ॒दि॒त्यानामरं॒कृते।।

महि वो मह॒तामवो॒ वरुण॒ मित्रार्यमन्। अवां॒स्या वृणीमहे।।

जी॒वान्नो अ॒भि धेत॒नादित्यासः पु॒रा हथात्। कद्ध स्थ हवनश्रुतः।।

यद्वः श्रा॒न्ताय सुन्व॒ते वरूथ॒मस्ति॒ यच्छ॒र्दिः। तेना नो॒ अधि वोचत।।

अस्ति देवा अं॒होरुर्वस्ति॒ रत्न॒मनागसः। आदित्या॒ अद्भुतैनसः।।

मा नः॒ सेतुः सिषेद॒यं म॒हे वृणक्तु न॒स्परि। इन्द्र॒ इद्धि श्रु॒तो व॒शी।।

मा नो मृचा रिपू॒णां वृजि॒नानामविष्यवः। देवा अ॒भि प्र मृक्षत।।

उ॒त त्वामदिते मह्य॒हं दे॒व्युप ब्रुवे। सु॒मृ॒ळी॒काम॒भिष्टये।।

पर्षि दी॒ने गभी॒र आँ उग्रपुत्रे॒ जिघांसतः। माकिस्तो॒कस्य नो रिषत्।।

अ॒ने॒हो न उरुव्रज॒ उरूचि॒ वि प्रसर्तवे। कृ॒धि तो॒काय जी॒वसे।।

ये मू॒र्धानः क्षिती॒नामदब्धासः॒ स्वयशसः। व्र॒ता रक्षन्ते अ॒द्रुहः।।

ते न आ॒स्नो वृकाणा॒मादित्यासो मु॒मोचत। स्ते॒नं ब॒द्धमिवादिते।।

अपो॒ षु ण इ॒यं शरु॒रादित्या॒ अप दुर्म॒तिः। अ॒स्मदे॒त्वजघ्नुषी।।

शश्व॒द्धि वः सुदानव॒ आदित्या ऊ॒तिभिर्व॒यम्। पु॒रा नू॒नं बुभु॒ज्महे।।

शश्वन्तं॒ हि प्रचेतसः प्रति॒यन्तं चि॒देनसः। देवाः कृणु॒थ जी॒वसे।।

तत्सु नो॒ नव्यं॒ सन्यस॒ आदित्या॒ यन्मुमोचति। ब॒न्धाद्ब॒द्धमिवादिते।।

नास्माकमस्ति॒ तत्तर॒ आदित्यासो अति॒ष्कदे। यू॒यम॒स्मभ्यं मृळत।।

मा नो हे॒तिर्वि॒वस्वत॒ आदित्याः कृत्रिमा॒ शरुः। पु॒रा नु ज॒रसो वधीत्।।

वि षु द्वेषो॒ व्यंह॒तिमादित्यासो॒ वि संहितम्। विष्व॒ग्वि वृहता॒ रपः।।

अन्य मह्त्त्वपूर्ण संदर्भ –

तेषां परिगृहीतानां यथा क्षुद्रा मत्स्या अक्ष्योर् अक्ष्य् अतिशीयेरन्न् एवम् एव ते क्षुद्राः पशव आसुस् ते अतिशेरुः। – जैमिनीय ब्राह्मण २.११०

प्रजापतिः प्रजा असृजत। ता अस्य सृष्टाः पराभवन्। – – – स द्वितीया असृजत। ता अस्य परैवाभवन्। ते मत्स्या अभवन्। – जै.ब्रा. १.१८७, २.२२८

अथ बृहती प्रत्यौहद् विराजं शक्वरीं रेवतीम् इति। तानीमान्य् अत्यायन्। तानि देवा अन्वपश्यन् यथा मत्स्यम् ऊर्म्या यन्तम् अनुपश्येद् एवम्। तानि सप्तमे ऽहन् समुदमज्जन् यथा मत्स्यास् समुन्मज्जयुर् एवम्। तान्य एतानि छन्दोमेषु सर्वाणि रूपाणि संसृज्यन्ते। – जै.ब्रा. ३.३२९

 

 

प्रथम लेखन – ८-१२-२०१०ई.(मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत् २०६७)