मतङ्ग-मत्स्येन्द्रनाथ

Puraanic contexts of words like Matanga, Mati / intellect / intention, Matsya / fish etc. are given here.

मतङ्ग पद्म १.३.१०६(मतङ्ग की ब्रह्मा के पद से उत्पत्ति), ब्रह्माण्ड २.३.१३.१०६(गया में भरत आश्रम में अरण्य में मतङ्ग वन का महत्त्व), ३.४.३१.९०(मतङ्ग – पुत्र मातङ्ग द्वारा देवी को मातङ्गी पुत्री रूप में प्राप्त करने का वृत्तान्त), वराह ८(धर्मव्याध – पुत्री अर्जुनका के मतङ्ग – पुत्र से विवाह का वर्णन), वायु ७७.३६/२.१५.३६(कौशला में मतङ्गवापी में स्नान के महत्त्व का कथन), ७७.९८/२.१५.९८(भरत के आश्रम में अरण्य में मतङ्गपद के दिखाई देने का कथन), १०८.२५/२.४६.२५(वही), १११.२४/२.४९.३०(मतङ्गवापी में श्राद्ध हेतु मन्त्र), विष्णुधर्मोत्तर १.२५१.११(इरा व पुलह से उत्पन्न ८ मतङ्गजों/हस्तियों के नाम व लक्षण, ४ जातियां व निवासभूत ८ वनों के नाम), स्कन्द २.१.३९(अञ्जना द्वारा मतङ्ग ऋषि के निर्देशानुसार तप), ४.२.९७.१६०(मतङ्गेश लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य : ज्ञान, विद्या प्रबोधक), ५.२.६०(मतङ्गेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, सुगति – पुत्र मतङ्ग द्वारा गर्दभी मुख से स्व – कुल का वृत्तान्त सुनकर तप, अन्त में मतङ्गेश्वर की पूजा से ब्राह्मणत्व प्राप्ति), वा.रामायण ३.७३(कबन्ध द्वारा राम को मतङ्ग आश्रम का परिचय देना), ४.११(दुन्दुभि दैत्य के रक्त से स्पर्श होने पर मतङ्ग ऋषि द्वारा बाली को शाप), लक्ष्मीनारायण १.५७२.४(अशोकवनिका में मतङ्ग के तप का वृत्तान्त), कथासरित् ४.२.२५४(मतङ्ग नामक जीमूतवाहन के सम्बन्धी का उल्लेख), ११.१.८१(मतङ्ग मुनि द्वारा समुद्र तट पर प्राप्त कन्या वेला को पालन हेतु स्वपत्नी यमुना को देना, कालान्तर में वेला व वेला – पति को वियोग का शाप व शाप मोक्षण), १२.३४.१५०(मतङ्ग मुनि व उनकी कन्या यमुना द्वारा मार्ग से नष्ट युवती मन्दारवती का पालन, कालान्तर में मन्दारवती का स्वपति सुन्दरसेन से मिलन), १४.४.१७९(मन्दर – कन्या मतङ्गिनी आदि ५ सखियों का नरवाहनदत्त द्वारा परिणय), १६.२.९(मतङ्गदेव विद्याधर व अशोकमञ्जरी की पुत्री सुरतमञ्जरी का वृत्तान्त), १६.२.१८७(मतङ्गदेव विद्याधर का शिव के शाप से उज्जयिनी में चाण्डाल बनना, १८ सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराने पर शापमुक्त होना ), द्र. मातङ्ग matanga

Comments on Matanga

 

मता मत्स्य १३.४४(पारावार तट पर देवी की मता नाम से स्थिति का उल्लेख )

 

मति गरुड १.२१.४(वामदेव शिव की १३ कलाओं में से एक), देवीभागवत १.१७.३९(शास्त्रज व  मतिज चातुर्य – द्वय का उल्लेख; मति के युक्त व अयुक्त प्रकार – द्वय का उल्लेख), ब्रह्माण्ड १.२.१३.९२(याम संज्ञक गण के १२ देवों में से एक), १.२.३६.५६(आभूतरय संज्ञक गण के देवों में से एक), १.२.३६.७२ (भाव्य संज्ञक गण के ८ देवों में से एक), मार्कण्डेय १००.३८/९७.३८(ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर के श्रवण से शुभ मति प्राप्ति का उल्लेख), वायु ४.३०/१.४.३२(मति शब्द की निरुक्ति), ५९.७७(भगवान् के मति नाम का कारण), ६२.४८/ २.१.४८(आभूतरय संज्ञक देवों के गण में से एक), शिव ७.२.५.२४(मति का माता, मान आदि से सम्बन्ध), महाभारत आश्वमेधिक २१.११(मति के चित्त के आश्रित होने का प्रश्न व उत्तर ), द्र. अभिमति, दृढमति, भद्रमति, विमति, वेणुमति, सुमति mati

 

मत्कुण कथासरित् १०.४.१२७(मत्कुण/खटमल द्वारा राजा को काटने की उपकथा )

 

मत्त नारद १.६६.१३४(मत्तवाह गणेश की शक्ति चञ्चला का उल्लेख), १.६६.१३४(मत्त गणेश की शक्ति शशिप्रभा का उल्लेख), ब्रह्माण्ड ३.४.४४.६९ (५१ वर्णों के गणेशों में से एक), वायु ४४.१५(मत्तकासिक : केतुमाल देश के जनपदों में से एक ), द्र. उन्मत्त matta

 

मत्तर्ण पद्म ३.२६.७(कुरुक्षेत्र में मत्तर्ण द्वारपाल को अभिवादन का फल )

 

मत्सर गरुड २.२.७४(मात्सर्य से जात्यन्ध बनने का उल्लेख), नारद १.४३.७२(तप की मत्सर से रक्षा का निर्देश), वराह २७.३६(मत्सर के इन्द्राणी मातृका का रूप होने का उल्लेख), १४८.३२(मात्सर्य दोष),  स्कन्द ५.२.२५.४०, ५.३.१५९.१७(मात्सर्य दोष से जात्यन्ध होने का उल्लेख), महाभारत वन ३१३.९७(हृत्ताप के मत्सर होने का उल्लेख, यक्ष – युधिष्ठिर संवाद), शान्ति ३२९.११(श्री की मत्सर से रक्षा करने का निर्देश ) matsara

 

मत्स्य अग्नि २(मत्स्य अवतार की कथा : मनु के समक्ष प्रकट मत्स्य का विशाल बनना), गणेश २.९१.२१(गणेश द्वारा मत्स्य रूप धारण कर मत्स्यासुर का वध), गरुड १.८७.१२(प्रलम्ब दानव के वध हेतु विष्णु द्वारा मत्स्य रूप में अवतार), २.२.८०(जलहारी के मत्स्य बनने का उल्लेख), २.४६.२१(जलप्रस्रवण के भेदन से मत्स्य बनने का उल्लेख), ३.२२.४०(शिश्न, रसनाग्र, गुदा आदि पर मत्स्य का स्वरूप),  गर्ग २.२२.१७(मत्स्य रूप धारी पौण्ड्र असुर द्वारा हंस मुनि के निगरण पर कृष्ण द्वारा हंस मुनि की रक्षा), देवीभागवत ८.९.१८(मनु द्वारा रम्यक वर्ष में मत्स्य रूपी श्रीहरि की आराधना), नारद १.५६.७४४(मत्स्य देश के कूर्म के पाणि मण्डल होने का उल्लेख), १.११४.२(चैत्र शुक्ल पञ्चमी को मत्स्य जयन्ती होने से मत्स्यावतार उत्सव करने का निर्देश), पद्म ३.२४.३७(विमल तीर्थ में सौवर्ण व राजत मत्स्यों की स्थिति का उल्लेख), ६.९१.१(कश्यप की अञ्जलि में आई मछली द्वारा क्रमश: विशाल रूप धारण करने, समुद्र में शङ्ख दैत्य का वध करने और ऋषियों को समुद्र से वेदों का ग्रहण करने के निर्देश का कथन), ६.१२०.६२(मत्स्य से सम्बन्धित शालग्राम शिला के लक्षणों का कथन), ६.२३०.२६(समुद्र में प्रविष्ट वेदों के उद्धार हेतु विष्णु द्वारा मत्स्य रूप धारण कर जल में प्रवेश तथा मकर रूप धारी दैत्य का वध, वेदों का उद्धार), ब्रह्माण्ड २.३.३८.४२(परशुराम द्वारा कार्तवीर्य – सेनानी मत्स्यराज मंगल के वध का वृत्तान्त), भविष्य ३.४.२५.२७(यज्ञ से मत्स्य कल्प की उत्पत्ति? का उल्लेख, यज्ञ द्वारा मत्स्य कल्प को नमस्कार), ३.४.२५.१३०(नवम मत्स्य कल्प का वर्णन, कुबेर पुराण पुरुष से मत्स्य की उत्पत्ति), भागवत २.७.१२(युगान्त समय में मत्स्य द्वारा क्षोणीमयी नौका द्वारा जीवों की रक्षा करने व वेदों की रक्षा का कथन), ५.१८.२५(रम्यक वर्ष में मनु द्वारा मत्स्य अवतार के दर्शन व स्तुति), ६.८.१३(मत्स्य रूपी विष्णु से वरुण पाशों से रक्षा की प्रार्थना), ८.२४(मत्स्य अवतार की कथा, मत्स्य द्वारा हयग्रीव का वध), ९.२२.६(उपरिचर वसु के पुत्र चेदि राजाओं में से एक), ११.४.१८ (मत्स्य अवतार में भगवान् द्वारा मनु, इला व ओषधियों की रक्षा करने का उल्लेख), १२.१३.८(मत्स्य पुराण में १४ हजार श्लोक होने का उल्लेख),  मत्स्य १.२०(मनु के पाणि पर मत्स्य का प्राकट्य, मत्स्य द्वारा विशाल रूप धारण तथा मनु को प्रलय की सूचना देना), २.१७(मत्स्य द्वारा प्रलय के स्वरूप का वर्णन, मनु की नौका का उद्धार), ५०.२८(चैद्योपरिचर वसु व गिरिका के ७ पुत्रों में से एक), ५८.१८(तडाग आदि निर्माण में राजत मत्स्य दान का निर्देश), मार्कण्डेय १५.१८(अकृतज्ञ व कृतघ्न मनुष्य को मत्स्य योनि प्राप्ति का उल्लेख), वराह ९(वेदों के उद्धार हेतु मत्स्य अवतार, देवों द्वारा स्तुति), १२२(कोकामुख क्षेत्र के प्रभाव से मत्स्य को उत्तम योनि की प्राप्ति), १४०.८१(कोकामुख क्षेत्र में मत्स्यशिला तीर्थ का वर्णन), वामन ९०.१(मानस ह्रद में विष्णु का मत्स्य रूप में निवास), वायु १.३४(पितरों की मानसी कन्या वासवी द्वारा मत्स्य योनि में उत्पन्न होकर व्यास – माता बनना), ४७.४८(मात्स्य : गङ्गा द्वारा प्लावित आर्य जनपदों में से एक), ६०.६४(देवमित्र शाकल्य के ५ शिष्यों में से एक, गुरु से संहिता प्राप्ति का उल्लेख), ९९.२२२/ २.३७.२१७(मत्स्यकाल : विद्योपरिचर वसु व गिरिका के ७ पुत्रों में से एक), विष्णु ४.१९.८१(मात्स्य : उपरिचर वसु के ७ पुत्रों में से एक), विष्णुधर्मोत्तर १.१७८(मत्स्य रूपी विष्णु द्वारा प्रलम्ब का वध), ३.३७.११(पुरुष की प्रतिमा निर्माण में नेत्रों को मत्स्याकृति बनाने का निर्देश), ३.११९.२(मत्स्य की समुद्र पोत यात्रा में पूजा), ३.१२१.३(काश्मीर देश में मत्स्य की पूजा का निर्देश), स्कन्द १.२.१३.१९४(शतरुद्रिय प्रसंग में मत्स्य द्वारा शास्त्र लिङ्ग की वृषाकपि नाम से पूजा का उल्लेख), २.२.३७.५५(राजा श्वेत द्वारा विष्णु के मत्स्यावतार के समय सायुज्य प्राप्ति का वर प्राप्त कर श्वेत माधव होना), २.२.३८.११४(मत्स्यावतार काल में दमनक दैत्य में मुक्तिदायिनी विष्णु भक्ति का आविर्भाव), २.५.१४(मार्गशीर्ष मास में मत्स्य उत्सव का वर्णन), ४.२.६१.२०७(विष्णु के २० मत्स्य रूपों का उल्लेख), ५.२.६९.३१(नृप द्वारा पूर्व जन्म के वृत्तान्त का कथन : शूद्र द्वारा अन्तकाल में धर्म की प्रशंसा से मत्स्य योनि प्राप्त करना आदि), ५.३.१३.४५(नर्मदा माहात्म्य के अन्तर्गत मात्स्य कल्प का उल्लेख), ५.३.१५९.२१(बहते जल में बाधा डालने वाले को मत्स्य योनि प्राप्त होने का उल्लेख), ७.१.३००+ (सङ्गालेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, त्रिनेत्र मत्स्यों वाली गङ्गा का आह्वान), महाभारत वन १८७.६(वैवस्वत मनु द्वारा तप काल में क्षुद्र मत्स्य की प्राप्ति, मत्स्य द्वारा विराट रूप धारण करना), ३१३.६२(मत्स्य द्वारा सोने पर भी निमेष न करने का उल्लेख, यक्ष – युधिष्ठिर संवाद), शान्ति १३७(संकट से स्वयं की रक्षा के संदर्भ में दीर्घकालज्ञ, उत्पन्नप्रतिभा/ सम्प्रतिपतिज्ञ व दीर्घसूत्री मत्स्यत्रय का आख्यान), ३०१.६५(दुःख रूपी उदक में तम: रूपी कूर्म और रज मीन का उल्लेख), योगवासिष्ठ १.१७.४४(मत्स्यी की तृष्णा से उपमा), लक्ष्मीनारायण १.१३२(मत्स्य अवतार द्वारा प्रलय के समय में बीजों सहित नौका की रक्षा), १.२७०.२(चैत्र शुक्ल पञ्चमी को मत्स्य जयन्ती महोत्सव की विधि), १.४९५.२९(मत्स्य द्वारा जल में अदृश्य अग्नि की स्थिति बताने पर अग्नि द्वारा मत्स्यों को शाप), १.४९५.६६(वह्नि द्वारा मत्स्यों को उत्शाप के रूप में वंश वृद्धि का वरदान), १.५४८.२७ (त्रिनेत्र तीर्थ का वर्णन : शिव के वरदान स्वरूप ऋषियों को तृतीय दिव्य नेत्र की प्राप्ति, मत्स्यों को भी त्रिनेत्रता की प्राप्ति ) २.१६१.९२(धनमेद नामक भक्त धीवर द्वारा बन्धित मत्स्य द्वारा धीवर को विराट् रूप दिखाने का कथन), ३.१०६.६२(जल में तपोरत शम्भलवार मुनि को नारायण द्वारा मत्स्य रूप में दर्शन तथा वर प्रदान का वृत्तान्त), ३.१६४.२१(औत्तम मन्वन्तर में मत्स्यावतार द्वारा प्रलम्ब दानव के वध का कथन), ३.१७०.१४(३४ अवतारों में १२वें अवतार के रूप में मत्स्यावतार का उल्लेख), ३.१७५.३(संसार सागर में तन्मात्राहार रूपी मत्स्यों आदि का कथन), ३.१९५.१(मत्स्या नदी के तट पर मायूर पुरी में हर्षुल नामक भक्त के पुत्र की विष से मृत्यु और साधु द्वारा जीवन दान देने का वृत्तान्त), ३.२३०.१(मत्स्य पत्तन में धीरपर्वा नामक भक्त धीवर द्वारा मत्स्यों को जीवन दान के अल्प पुण्य से वैष्णव कुल में जन्म व अक्षर धाम प्राप्ति का वर्णन), कथासरित् १.५.१६(वररुचि द्वारा मृत मत्स्य के हंसने का कारण ज्ञात करना), १०.४.८३(बगुले द्वारा मत्स्यों को खा जाने की कथा?), १०.४.१७८(अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति व यद्भविष्य नामक तीन मत्स्यों की कथा), १२.७.१९५(शङ्खदत्त के मत्स्य उदर से जीवित निकलने का कथन), १८.४.११०(मत्स्य के उदर से राजकन्या का वाहन सहित जीवित निकलना), १८.४.२३०(कन्दर्प – पत्नी सुमना का मत्स्य के उदर से जीवित निकलना ) matsya

Esoteric aspect of Matsya/Vedic view of Matsya

 

मत्स्य- ब्रह्माण्ड २.३.३८.४२(परशुराम द्वारा मत्स्यराज मङ्गल के वध का वृत्तान्त), मत्स्य २२.४९(मत्स्य नदी : पितरों के श्राद्ध हेतु प्रशस्त स्थानों में से एक), १९६.१६(मत्स्याच्छाद्य : आङ्गिरस कुल के त्र्यार्षेय प्रवर प्रवर्तक ऋषियों में से एक), १९६.४१(मत्स्यदग्ध : आङ्गिरस कुल के त्र्यार्षेय प्रवर प्रवर्तक ऋषियों में से एक),

 

मत्स्यगन्धा नारद २.२९.२२(ब्रह्महत्या के मीनगन्धा होने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड २.३.१०.७३(पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा के अमावसु व अद्रिका की मत्स्य पुत्री के रूप में जन्म का वृत्तान्त), मत्स्य १४.१३(पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा के मत्स्ययोनिजा बनने का वृत्तान्त), स्कन्द ५.३.९७(वसु राजा के वीर्य से मत्स्य उदर में मत्स्यगन्धा की उत्पत्ति की कथा, पराशर से व्यास के जन्म की कथा), लक्ष्मीनारायण १.४८२.७(पराशर द्वारा वसु राजा के वीर्य से मत्स्यगन्धा कन्या के जन्म के वृत्तान्त का वर्णन ) matsyagandhaa

 

मत्स्येन्द्रनाथ नारद २.६९.२३(मत्स्येन्द्रनाथ के चरित्र का वर्णन, विज्ञान पारङ्गत योगी मत्स्यनाथ का पार्वती – पुत्र सिद्धनाथ के रूप में तपस्यारत होने का वर्णन), भविष्य ३.४.१२.४५(मच्छन्द व रम्भा से नाथशर्मा की उत्पत्ति का कथन), स्कन्द ६.२६३.६१(मत्स्य उदर से मत्स्येन्द्रनाथ की उत्पत्ति की कथा, शिव द्वारा मत्स्येन्द्रनाथ नामकरण ) matsyendranaatha/ matsyendranatha

Advertisements