मण्डूक

मन्दविष सर्प – जलपाद मण्डूकस्य कथा काकोलूकीयम्-15(239)

संक्षेपरूपेण कथा एवंप्रकारेण अस्ति। एको मन्दविषः सर्पः सरोवर तटे अनशन अवस्थायां स्थितो भवति येनोपरि एको मण्डूकः तस्य निष्चेष्टतायाः कारणं पृच्छति। मन्दविष सर्पः कथयति यत् मण्डूकभ्रमतया तेन कस्यचित् ब्राह्मणपुत्रस्य अंगुष्ठे दष्टः येन कारणेन सः मृतिमगात्। तस्य पित्रा अहं शप्तः यत् त्वं मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि, तेषां प्रसादलब्धजीविकां वर्तिष्यसि। अतः अहं मन्दविषः सर्पः परोक्षेण मण्डूकानां वाहनं भवामि।

वाहनं भूत्वा सः तान् मण्डूकान् खादति स्म। तेन सर्वेषामेव मण्डूकानां भक्षणं कृतमासीत्।

कथं पंचतन्त्रे सार्वत्रिक रूपेण सर्पेभिः मण्डूकानां भक्षणस्य उल्लेखं भवति। अस्य मूलं आयुर्वेदे नाडी दर्शने अन्वेषणीयः।

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अयं चित्रः वसंत दत्तात्रेय लाडस्य Secrets of the Pulse (मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली) पुस्तकतः गृहीतं भवति।

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उपरोक्त चित्र लिवर सिरोसिस से ग्रस्त एक रोगी की नाडी का है जिसमें रक्त का प्रवाह यकृत से न होकर वैकल्पिक नाडियों से हो रहा है। स्वस्थ स्थिति संख्या 2 द्वारा प्रदर्शित की गई है। यहां सर्प गति तीर द्वारा प्रदर्शित की गई है। मण्डूक गति अण्डाकार वक्रों द्वारा। नाडी के दो स्पन्दनों के बीच के काल में सर्प एवं मण्डूक दोनों ही गतियां अनुपस्थित हैं। लेकिन आतुर स्थिति में मण्डूक गति तो रुक जाती है, किन्तु सर्प गति नहीं रुकती(चित्र संख्या 1)। पंचतन्त्र की कथा के अनुसार सर्प अन्ततः सभी मण्डूकों का भक्षण कर लेता है। यह स्थिति कदापि स्वागत योग्य नहीं कही जा सकती।

शतपथ ब्राह्मण 9.1.2.21 के अनुसार प्राण ऋषि अग्नि का संस्कार करते हैं, उसे जल से धोते हैं। इस प्रक्रिया में जो जल बहे, वह मण्डूक बन गए –

एतद्वै यत्रैतं प्राणा ऋषयोऽग्रेऽग्निं समस्कुर्वंस्तमद्भिरवोक्षंस्ता आपः समस्कन्दंस्ते मण्डूका अभवन् – ९.१.२.[२१]

अनुमानहै कि नाडीपरीक्षा काल में मण्डूक रूप में जिन स्पन्दनों का संज्ञान होता है, वे रक्त द्वारा किसी नाडी विशेष में बलपूर्वक प्रवेश के सूचक हैं। यदि मण्डूक गति उपलब्ध नहीं है, केवल सर्प गति ही है, तब यह संकेत है कि रक्त का प्रवाह अपेक्षित नाडी के माध्यम से अवरुद्ध है। जबविशिष्ट नाडी से रक्त का प्रवाह अवरुद्ध होगा, तब रक्त वैकल्पिक मार्ग से हृदय में प्रवेश करेगा। इसका सूचक सर्प गति है।

जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, सर्प गति के ऊपर मण्डूक गति आरोपित है। अतः जब पंचतन्त्र की कथा में मण्डूक सर्प को अपना वाहन बनाते हैं, तो यह कहना उचित ही है।

गर्ग संहिता ५.२४.६० में मण्डूक देव शेषावतार बलराम का साक्षात्कार करता है। मण्डूक का सर्पगति में रूपान्तरित हो जाना किन स्थितियों में प्रशस्त हो सकता है, यह ज्ञात नहीं है।

माण्डूक्योपनिषदे में ओंकार का प्रतिपादन है।

ऋग्वेद 7.103 सूक्त मण्डूक सूक्त है। वहां ऋत्विज ही मण्डूक हैं। वे ऋत्विज अपने तप से बादलों को उत्पन्न करते हैं। उनका तप ही घर्मकाल है। जब बादल वर्षा करते हैं तो ऋत्विक् रूप मण्डूक शब्द करते हैं।

शतपथ ब्राह्मण 9.1.2 में किसी तन्त्र में व्यवस्था की स्थापना के लिए क्या विशेष उपाय किए जाने चाहिएं, यह कहा गया है। व्यवस्था अर्थात् अव्यवस्था या एण्ट्रांपी का न्यूनीकरण। यह प्रकृति अव्यवस्था वृद्धि के प्रति अग्रसर हो रही है, किन्तु जीवमात्र की उत्पत्ति व्यवस्था में वृद्धि का परिणाम है। शतपथ ब्राह्मण के अष्टम काण्ड की संज्ञा चिति है, नवम काण्ड की संचिति, अतिविशिष्ट व्यवस्था। यहां शतरुद्रिय नियम का व्यवहार है। शतरुद्रिय अर्थात् हमारा जीवनतन्त्र शतधा अव्यवस्थित है। इस हेतु शतसंख्या रुद्रों की कल्पना की गई है। रुद्र सर्प ही हैं,यह अनुमान है। उन सौ रुद्रों के सौ विशिष्ट अर्चक होते हैं, उनके द्वारा निर्मित लिङ्ग भी विशिष्ट नामों वाले हैं। इसका विवरण स्कन्द पुराण में है। इस प्रकार व्यवस्था की स्थापना करके, अन्य शब्दों में, रुद्रों का शमन करके, उसके पश्चात् आनन्द की स्थिति का आविर्भाव होता है जहां ऋत्विज सोम की वर्षा के कारण मण्डूक की भांति शब्द करते हैं। अन्य शब्दों में कठोर साधना रूपी रुद्र या सर्प आनन्द रूपी मण्डूक प्राणों का आधार, वाहन होते हैं।  पञ्चतन्त्र की कथा कहती है – यदि शतरुद्रिय साधना पूर्ण न हुई तो असंतुष्ट रुद्र सर्परूप धारण करके डसेंगे। वह सर्प सब मण्डूकों का भक्षण कर जाएगा।

कथा में मण्डूक का जलपाद नाम सार्थक है। जलपाद अर्थात् जडपाद। जिन मण्डूक प्राणों का आधार जड है, वह सर्प के भक्ष्य बनेंगे।

यजुर्वेद में व्यवस्था हेतु शतरुद्रिय है। सोमयाग में यह व्यवस्था षडह अर्थात् छह दिनों के याग द्वारा स्थापित की जाती है। तदनन्तर त्रिदिवसीय छन्दोम होते हैं। उसके पश्चात् दशम अह अविवाक्य संज्ञा वाला होता है। अतीव आनन्द की स्थिति, वाक् द्वारा जिसका वर्णन असम्भव है। भागवत पुराण के प्रथम छह स्कन्ध तो वृत्र वध हेतु हैं। तत्पश्चात् तीन स्कन्ध छन्दोमों के समान हैं। उसके पश्चात् दशम स्कन्ध में कृष्ण जन्म होता है।

 

लब्धप्रणाशम्- कथा 2

गंगदत्त मण्डूकराजः – प्रियदर्शन सर्पः

अरघट्ट(रहट)

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यदा कोपि जनः बुद्धः भवति, तस्य संज्ञा अरिष्टनेमि अपि भवति। अरिष्टनेमि अर्थात् तस्य जनस्य प्रभावक्षेत्रे कोपि हिंसा न घटिष्यति। तीर्थंकर महावीर अस्य उदाहरणमस्ति।  स बुद्धः यं कमपि द्रक्ष्यसि, तत् प्रियमेव भविष्यति, नाप्रियं। वयं सर्वेपि जनाः तथैव वाञ्छन्ति, किन्तु वयं बुद्धाः नैवास्मः। वयम् पंचतन्त्रस्य प्रियदर्शन सर्पाः अस्मः। कथायाः प्रथम पात्रः मण्डूकराज गंगादत्तः अस्ति। सः एके कूपे निवसति। तत्र तस्य केचित् जातिबन्धवः तं द्वेषं कुर्वन्ति, केचित् परिजनाः तेन सह बन्धुत्वं धारयन्ति। स मण्डूकराजः प्रियदर्शन सर्पेण सह मैत्री स्थापितं करोति एवं तं सर्पं कूपे स्थापितुं प्रबन्धं करोति। स प्रियदर्शन सर्पः प्रथमेन तस्य मण्डूकराजस्य द्वेष्ट्रीन् खादति, तत्पश्चात् तस्य प्रेमी बान्धवान् खादति। केवलं मण्डूकराजः शेषं वर्तते। तदा सर्पस्य भोजन हेतु स मण्डूकराजः कूपात् बहिर्गच्छति एवं सर्पस्य भयकारणेन कदापि न पुनरागम्यते। अत्र मण्डूकराजस्य स्थितिः इन्द्रिस्य स्वामी इन्द्रस्य, मनस्य प्रतीयते। मण्डूकस्य कार्यं साधना न भवति, अपितु यत्किंचित् आनन्दं इन्द्रियाणि प्रदीयन्ते, तस्य भोगमात्र एव प्रतीयते। अस्माकं मनः इच्छति यत् यः कोपि अस्माकं द्वेष्टि, तस्य अस्तित्वं संसारे नैव भवतु। पुराणेषु अस्य निकटतम स्थितिः असूया उच्यते। असूया – ईर्ष्या। राजानः स्वयं श्रेष्ठं मन्यमानाः प्रजा साकं असूया धारयन्ति। तान् राजानाम् प्रजा अपदस्थं करोति। किन्तु असूयायाः अन्यमर्थमपि भवति। सूया अर्थात् किमपि कार्य करणात् पूर्वम् सविता देवता माम् सम्यक् प्रेरणा प्रदास्यति। यदि अयं स्थिति न भवति, तर्हि कार्यस्य सम्पादनं सर्वश्रेष्ठं न भविष्यति। तथा अहं तद्हेतु प्रारब्धं तथा स्वसहयोगी जनेषु दोषारोपणं करिष्यामि। अतः मण्डूकराज रूपी मनः असन्तुष्ट प्राण, रौद्र प्राण रूपी सर्पं कूपे स्थापयति। कूपे अवतरितुं कः उपायः भवतु, अस्मिन् संदर्भे अरहट्टस्य उल्लेखं भवति। पंचतन्त्रस्य कथा किमपि नामं रहस्यस्य स्थापनार्थं एव दास्यति, अयं विश्वासः।

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