मणिकुण्डल-मण्डूक

Puraanic contexts of words like Mangalaa, Mani / gem, Manikarnikaa, manipuura, manibhadra, mandapa, mandala, manduuka are given here.

मणिकुण्डल ब्रह्म २.१००/१७०(गौतम द्वारा वैश्य सखा मणिकुण्डल के धन का हरण व चक्षु छेदन किए जाने पर विभीषण द्वारा मणिकुण्डल की चिकित्सा, महाराज राजा की कन्या से विवाह ) manikundala

मणिग्रीव गर्ग १.१९.२७(देवल के शाप से मणिग्रीव का अर्जुन वृक्ष बनना), ७.२४.१(कुबेर – पुत्र मणिग्रीव का प्रद्युम्न – सेनानी चन्द्रभानु से युद्ध), भविष्य ३.२.९.९(मदपाल वैश्य के पुत्र मणिग्रीव व कामालसा की कथा), भागवत १०.९.२३(नारद के शाप से वृक्ष बने कुबेर – पुत्र मणिग्रीव का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.३२१.११३(शूद्रजातीय मणिग्रीव द्वारा पुरुषोत्तम मास में दीपदान आदि करने से दारिद्र्य नाश व चित्रबाहु राजा के रूप में पुन: जन्म लेने की कथा ) manigreeva/ manigriva

मणिदेव भविष्य ३.३.३०.७३(पूर्वजन्म में मणिदेव यक्ष की प्रिया पद्मिनी का वर्णन ) manideva

 

मणिधर ब्रह्माण्ड १.२.१८.१२(विशोक नामक देवारण्य में मणिधर यक्ष के निवास का उल्लेख), १.२.३६.२१६(मणिधर यक्ष के पिता रजतनाभ का संदर्भ), मत्स्य १२१.१३(मणिधर यक्ष का विशोक वन में हेमशृङ्ग पर्वत पर वास ) manidhara

 

मणिनाग ब्रह्म २.२०(शेष नाग – पुत्र, तप द्वारा गरुड से अभय प्राप्ति, गरुड का रोष), स्कन्द ५.३.७२.३६(मणिनाग तीर्थ का माहात्म्य, कद्रू- विनता – उच्चैःश्रवा की कथा, कद्रू के शाप विनाशार्थ मणिनाग द्वारा तप करके लिङ्ग की स्थापना),

 

मणिपर्वत वायु ३७.१६(विकङ्क व मणिशैल के बीच स्थित चम्पक वन का संदर्भ), विष्णु ५.२९.१०(नरकासुर द्वारा मन्दर के शृङ्ग मणिपर्वत के हरण का उल्लेख), ५.२९.३४(श्रीहरि द्वारा मणिपर्वत आदि को गरुड पर आरोपित करके ले जाने का उल्लेख ) maniparvata

 

मणिपूर गणेश १.३७.४३(त्रेतायुग में पुष्पक नगर की मणिपूर नाम से ख्याति का उल्लेख), भविष्य ३.२.२८.२(मणिपूर के राजा चन्द्रचूड द्वारा सत्यनारायण की भक्ति), वराह १४८.६४(धूतपाप होने तक मणिपूर पर्वत से धारा पतन न होने का उल्लेख), १४९.६०(मणिपूर से चक्र तीर्थ पर ५ धाराओं के पतन का उल्लेख), स्कन्द ५.२.१०.५(माता के शाप से त्रस्त शङ्खचूड नाग के मणिपूर जाने का उल्लेख), महाभारत आश्वमेधिक ८०.४१(मणिपूर के राजा बभ्रुवाहन तथा संजीवनी मणि का प्रसंग ) manipoora/ manipura

 

मणिप्रदीप स्कन्द ४.१.३३.१५७(मणिप्रदीप नाग का संक्षिप्त माहात्म्य), ४.२.६८.८१(मणिप्रदीप नाग के समक्ष मणिकुण्डल का संक्षिप्त माहात्म्य ) manipradeepa/ manipradipa

 

मणिबन्ध विष्णुधर्मोत्तर २.१०९(विभिन्न प्रकार की आथर्वण मणियों के खनन व मन्त्र सहित बन्धन की विधि ) manibandha

 

मणिभद्र ब्रह्माण्ड २.३.७.१२०(रजतनाभ व मणिवरा – पुत्र, पुण्यजनी व देवजनी – पति, पुत्रों के नाम), मत्स्य १२१.८(चन्द्रप्रभ पर्वत पर मणिभद्र यक्ष का निवास), वामन १७.३(यक्षराज मणिभद्र से वट वृक्ष की उत्पत्ति), वायु ४७.७ (यक्ष – सेनापति मणिभद्र का चन्द्रप्रभ गिरि पर निवास), ६९.१५२(रजतनाभ व भद्रा – पुत्र, पुण्यजनी – पति, मणिभद्र यक्ष के पुत्रों व कन्याओं के नाम), विष्णुधर्मोत्तर ३.७३.१३(मणिभद्र की मूर्ति का रूप), शिव २.२.३७.५३(दक्ष यज्ञ के विध्वंस में मणिभद्र द्वारा भृगु की दाढी मूंछ नोचने का उल्लेख), ४.१७.६(मणिभद्र नामक गण द्वारा चन्द्रसेन को चिन्तामणि भेंट करने का कथन), स्कन्द १.२.६२.३५(निधियों में मणिभद्र जाति के क्षेत्रपालों की स्थिति का उल्लेख), ३.३.५(मणिभद्र द्वारा चन्द्रसेन राजा को चिन्तामणि प्रदान करना?), ५.२.७५(मणिभद्र द्वारा पुत्र वडल को शाप देने व शापमुक्त करने की कथा), ६.१९, ६.१५५+ (कृपण व कुरूप क्षत्रिय मणिभद्र द्वारा पुष्प ब्राह्मण का अपमान, पुष्प द्वारा सूर्य आराधना से मणिभद्र की पत्नी पर अधिकार, मणिभद्र को राजा से मृत्युदण्ड की प्राप्ति), वा.रामायण ७.१२(कुबेर – अनुचर मणिभद्र का धूम्राक्ष से युद्ध, पार्श्व मौलि नाम प्राप्ति), ७.१५.१५? (कुबेर अनुचर महायक्ष मणिभद्र का धूम्राक्ष व रावण से युद्ध, पार्श्व मौलि नाम प्राप्ति), कथासरित् २.५.१६५(शक्तिमती द्वारा मणिभद्र यक्ष की मूर्ति से प्रतिष्ठित मन्दिर में पर स्त्री के साथ बन्द अपने पति समुद्रदत्त की रक्षा का प्रसंग), १८.२.३(धनद – भ्राता मणिभद्र की गेहिनी मदनमञ्जरी को खण्डकापालिक द्वारा वश में करने के यत्न का वृत्तान्त ) manibhadra

 

मणिमान् पद्म ३.२५.७(मणिमान् तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य : अग्निष्टोम फल की प्राप्ति), भागवत ४.४.४(त्रिनेत्र शिव के अनुचरों में से एक), ४.५.१७(दक्ष यज्ञ विध्वंस के समय मणिमान् द्वारा भृगु ऋषि को बांधना), वायु ६९.१५८/ २.८.१५३(मणिवर व देवजननी के यक्ष पुत्रों में से एक ) manimaan

 

मणिवक्त्र मत्स्य ५.२२(आप नामक वसु के चार पुत्रों में से एक),

 

मणिवर हरिवंश १.६.३३(मणिवर – पिता रजतनाभ को दोग्धा बनाकर यक्षों द्वारा पृथिवी को दुहने का वर्णन),

 

मण्डप अग्नि ५६(मण्डप निर्माण विधि), ९५.१७(लिङ्ग प्रतिष्ठा हेतु मण्डप प्रकार व निर्माण विधि), ब्रह्माण्ड ३.४.३४.८५(सहस्रस्तम्भ मण्डप), भविष्य २.३.१२(मण्डप प्रतिष्ठा विधान), मत्स्य २७०(२७ प्रकार के मण्डपों के नाम, स्वरूप भेद, निर्माण विधि), स्कन्द १.१.२४(शिव विवाह  मण्डप का वर्णन), २.४.३२(तुलसी निमित्त मण्डप), २.४.३३.५४(द्वादशी पूजा निमित्त मण्डप निर्माण का उल्लेख), ४.२.७९.५६(काशी में निर्वाण, मुक्ति, ज्ञान, शृङ्गार, ऐश्वर्य मण्डपों का माहात्म्य), ४.२.९८.८२+ (मुक्ति मण्डप, शृङ्गार आदि मण्डपों  का माहात्म्य), योगवासिष्ठ ३.१५(मण्डप उपाख्यान), ६.२.८(माया मण्डप), ६.२.९३(आकाश मण्डप), लक्ष्मीनारायण २.१९(कृष्ण की द्वितीय जन्म तिथि पर मण्डप निर्माण का वर्णन), २.२३४(कृष्ण की १५वीं जयन्ती उत्सव हेतु विश्वकर्मा द्वारा मण्डप निर्माण का वर्णन), २.२७८.३०(मण्डप द्वारा मुक्त स्वरूप दिखाकर स्वयं कृष्ण गृह में मण्डप बनने का वर्णन), २.२७९+ (विभिन्न मण्डप व उनके उपयोग), ४.४१.९०(कृष्ण की २१वीं जन्म तिथि पर मण्डप निर्माण का उल्लेख ) mandapa

 

मण्डल अग्नि २९(मन्त्र साधन हेतु सर्वतोभद्र मण्डल निर्माण), ३०(सर्वतोभद्र मण्डल पूजा विधान), १३०(७ – ७ नक्षत्रों के आग्नेय, वायव्य, दारुण, माहेन्द्र नामक ४ मण्डलों में उत्पातों के विभिन्न देशों पर प्रभावों का कथन), १४३+ (कुब्जिका पूजा हेतु मण्डल), ३१८(गणपति पूजा के संदर्भ में विघ्नमर्द मण्डल का कथन), ३१९(समण्डल वागीश्वरी पूजा का कथन), ३२०(सर्वतोभद्र आदि ८ प्रकार के मण्डलों की रचना विधि), गरुड १.८(मण्डल निर्माण विधि), १.१२६(मण्डल पूजा विधि), नारद १.२८.३२(श्राद्ध हेतु चार वर्णों के लिए मण्डलों के स्वरूपों का कथन), ब्रह्मवैवर्त्त १.२(गोलोक व वैकुण्ठ मण्डलों के अन्दर रासरासेश्वर कृष्ण के ज्योति स्वरूप का वर्णन), ब्रह्माण्ड १.२.२१.२०(मण्डलों के वर्णन के अन्तर्गत पृथिवी के मण्डल के रूप में घनोदधि, घनतेजा, घनवायु आदि का कथन), भविष्य १.१८७.१७(सूर्य के खखोल्क नामक मण्डल के महत्त्व का कथन), १.२०५.१(आदित्य हेतु मण्डल पूजा विधि, मण्डल देवताओं सहित भास्कर पूजा वर्णन के अन्तर्गत पूजा के वैदिक मन्त्र), २.१.२१(मण्डल निर्माण के विविध नाम), २.२.१+ (सूर्य की पीठिकाओं के क्रौञ्च आदि मण्डलों के विस्तार का वर्णन), २.२.२.१(सूर्य की पीठिका के परित: क्रौञ्च मण्डल निर्माण की विधि), २.२.२.४७(सुभद्र मण्डल निर्माण विधि), २.२.१०+ (वास्तुमण्डल निर्माण, देवार्चन आदि), ४.४४(आदित्य मण्डल दान व प्रतिग्रहण विधि), मत्स्य १७.३९(श्राद्ध के अवसर पर मण्डल ब्राह्मण आदि के पठन का निर्देश), १०४.९(प्रयाग में श्रीहरि द्वारा मण्डल की रक्षा का उल्लेख), १०८.९(प्रयाग के ५ योजन विस्तीर्ण मण्डल में प्रवेश पर अश्वमेध फल प्राप्ति का कथन), १११.८(वही), ११४.५६(भारत के पर्वतों के आश्रित जनपदों में  से एक), २५३(वास्तु मण्डल में देवों की स्थापना), २६२.६(मण्डला : पीठिकाओं के भेदों में से एक), २६२.१७(मण्डला रूपा पीठिका का फल : कीर्ति), २६५.२६(मूर्ति स्थापना के अवसर पर अध्वर्यु द्वारा मण्डलाध्याय आदि के जप का निर्देश), २६८(वास्तुमण्डल शान्ति विधि), वराह ९९.२२(विष्णु प्रीत्यर्थ द्वादशी तिथि को सर्वतोभद्र चक्र/मण्डल निर्माण की विधि), विष्णुधर्मोत्तर १.८८.८(ग्रहों व नक्षत्रों के मण्डलों के श्वेत आदि वर्णों का कथन), १.९४.१२(सर्वग्रह याग के अन्तर्गत ध्रुव के परित: मण्डल रचना का कथन), २.२९.१२(६४ पद वाले वास्तुमण्डल देवताओं का कथन), शिव ६.५(संन्यास मण्डल निर्माण की विधि का वर्णन), स्कन्द ३.२.३१.५८(धर्मारण्य की यात्रा के अन्तर्गत राम का एक रात्रि में माण्डलिक पुर में निवास का उल्लेख ), ७.१.१०.५(मण्डल तीर्थ का वर्गीकरण – पृथिवी), लक्ष्मीनारायण २.१३८.७३(प्रासाद के गर्भ मध्य से आरम्भ करके २४ मण्डलों के देवताओं का कथन), २.१५१.७७(सर्वतोभद्र मण्डल पूजन विधि), २.१५८.२०(नव प्रासाद के समीप ८१ पद मण्डल में कुम्भ स्थापना विधि ) mandala

 

मण्डूक गणेश २.१९.६(कूप नामक दैत्य द्वारा मण्डूक रूप धारण कर गणेश के वध का यत्न), गरुड ३.२९.११(मण्डूकिनी : मण्डूक-भार्या, भागीरथी का अंश), गर्ग ५.२४.६०(मण्डूक देव द्वारा बलराम दर्शन हेतु तप, बलराम से भागवत संहिता की मांग), पद्म ७.९.९७(राजा सत्यधर्म व महिषी विजया द्वारा भेक योनि प्राप्ति तथा भेक द्वारा गङ्गा का स्मरण करते हुए मृत्यु को प्राप्त करने पर अश्वमेध फल की प्राप्ति का वृत्तान्त), ब्रह्माण्ड २.३.७.१२३(मणिभद्र व पुण्यजनी के २४ यक्ष पुत्रों में से एक), मत्स्य ५८.१८(तडाग आदि निर्माण के अन्तर्गत ताम्र मण्डूक आदि दान का निर्देश), वायु ६९.२९७/२.८.२८९(अनुवृत्ता-सन्तान), विष्णुधर्मोत्तर २.१२०.२४(अग्नि हरण से भेक योनि प्राप्ति का उल्लेख), स्कन्द २.१.२६.५९(तुम्बुरु – पत्नी को शाप से मण्डूकी योनि की प्राप्ति, अगस्त्य द्वारा घोण तीर्थ माहात्म्य वर्णन से मुक्ति), ४.२.७४.६२(शिव निर्माल्य भक्षिका भेकी का पुष्प वटु के गृह में गृध्रमुखी, गीत रहस्य ज्ञाता कन्या रूप में जन्म लेना व शिव लिङ्ग की ज्योति में लीन होना), ५.३.१९८.८०(माण्डव्य में देवी का माण्डुकी नाम), ६.९०.४३(मण्डूक द्वारा देवों को अग्नि का निवास बताना, शाप व उत्शाप प्राप्ति), ७.१.३६१(मण्डूकेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य), महाभारत अनुशासन ८५.३०(मण्डूकों को अग्नि के शाप व देवों के वरदान का कथन), योगवासिष्ठ १.१८.४९(शरीर की मण्डूक से उपमा), ३.२४.५०(शुक्र के वाहन मण्डूक का उल्लेख), ५.५२.१४(मण्डूकि की मन से उपमा), लक्ष्मीनारायण १.३३७.४४(मण्डूकाक्ष : शङ्खचूड – सेनानी, मङ्गल से युद्ध), १.४७१(शिव मन्दिरस्थ माण्डूकी की कथा), १.४९५.३९(भेक/मण्डूक द्वारा अग्नि से शाप प्राप्ति), कथासरित् ३.६.७६(भेकों द्वारा देवों को अग्नि के जल में छिपे होने का रहस्योद्घाटन करने पर अग्नि द्वारा भेकों को शाप), ६.४.१३१(घट में रखे गए मण्डूक को जान लेने से हरिशर्मा को अपार धन की प्राप्ति ) mandooka/manduuka /manduka

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