मकर

मकर

टिप्पणी – पुराणों में मकर के महत्त्व से हम परिचित ही हैं। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण का आरम्भ होता है। गंगा का वाहन मकर है। कामदेव को मकरध्वज कहा जाता है इत्यादि। ऐसा प्रतीत होता है कि पुराणों में मकार को परोक्ष रूप से मकर नाम दे दिया गया है। अतः मकर को समझने के लिए मकार को समझने की आवश्यकता है। प्राणायाम की व्याख्या ओंकार के तीन अक्षरों के आधार पर की जाती है – अ, उ तथा म। अ अक्षर वायु के पूरण का प्रतीक है। उ अक्षर वायु के धारण का, कुम्भक का प्रतीक है। म अक्षर वायु के विसर्जन या रेचक का प्रतीक है। इस तथ्य को बृहत्तर रूप में इस प्रकार कहा जा सकता है कि अ द्वारा धनात्मक ऊर्जा का, प्राणों का ब्रह्माण्ड से पूरण करना है। ब्रह्माण्ड में तो बहुत प्रकार के प्राण हैं। लेकिन कोई ऐसी विधि निकालनी है कि केवल धनात्मक प्राणों का ही अवशोषण हो। आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार इसे इस प्रकार कहा जा सकता है कि हम जिन प्राणों का ग्रहण करें, चाहे वायु के रूप में, चाहे भोजन के रूप में, वह हमारे अन्दर धनात्मकता उत्पन्न करें, ऋणात्मकता उत्पन्न न करें। फिर उकार कोई ऐसा तन्त्र है जिसके द्वारा अवशोषित धनात्मक प्राणों को अपने अन्दर स्थिर करना है, उकार का कार्य योनि जैसा होगा जिसमें धनात्मक प्राण वर्धन कर सकेंगे। फिर जिन प्राणों का वर्धन नहीं हो सका, उनको बाहर फेंकना है। यह कार्य मकार के द्वारा करने का निर्देश है। यदि बाहर फेंकने के लिए कुछ शेष नहीं बचा है, तो अपने संचित प्राणों को बाहर भेजा जा सकता है। कहा गया है कि हमारी इन्द्रियों को जो शक्ति मिलती है, वह दो प्रकार की है – ऊष्माण व अन्तस्थ। ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुः अन्तस्था बलमात्मनः।। – भागवत पुराण। वर्णमाला में म के बाद जिन वर्णों के स्थान दिया गया है, वह हैं – य, र, ल, व, श, ष, स, ह। इनमें य, र, ल, व अन्तस्थ प्रकार के हैं, अर्थात् उनको बोलने में ऊष्णा का अवशोषण होता है। श, ष, स वर्ण ऊष्माण प्रकार के हैं जिनको बोलने में ऊष्मा का जनन होता है। यह कहा जा सकता है कि सामान्य रूप से हमारी इन्द्रियों को जो शक्ति मिल रही है, वह हमारी चेतना द्वारा म यन्त्र के माध्यम से बाहर फेंके गए व्यर्थ प्राण हैं, जिनका चेतना उपयोग नहीं कर पाई है। ऐसा सम्भव है कि चेतना की वह स्थिति आ जाए जब बाहर फेंकने को कुछ भी शेष न रहे। तब वह अपनी संचित ऊर्जा बाहर फेंक सकती है। यह ऊर्जा अन्तस्थ प्रकार की होगी। अन्तस्थ व ऊष्माण ऊर्जाओं में अंतर यह होगा कि ऊष्माण प्राण से सक्रिय इन्द्रियों को अन्तर्मुखी नहीं किया जा सकता, अन्तस्थ ऊर्जा से सक्रिय इन्द्रियों को अन्तर्मुखी किया जा सकता है। इसी कारण कहा गया है कि जब सूर्य मकर राशि में आता है, तब उत्तरायण का, देवयान का, धनात्मकता का आरम्भ होता है।

कामदेव की मकर ध्वज का मकार दोनों प्रकार का हो सकता है – बेकार ऊर्जा वाला भी और अन्तस्थ प्रकार वाला भी।

गर्ग संहिता में मकर गिरि पर मधु मक्षिकाओं का वास कहा गया है जो काट लेती हैं। उपरोक्त कथन के अनुसार ही इसकी व्याख्या की जा सकती है।

मकर संक्रान्ति पर खिचडी  द्रव्य का प्रयोग सार्वत्रिक रूप से किया जाता है। यह अन्वेषणीय है कि मकर संक्रान्ति का खेचरी मुद्रा या खेचरी स्थिति से क्या सम्बन्ध है।

मकार के लिए ओंकार शब्द पर टिप्पणी पठनीय है।

प्रथम लेखन – 30-5-2015ई.(ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी, विक्रम संवत् 2072)

पिङ्गलः

यः अव्यवस्थितां ऊर्जां व्यवस्थितां ऊर्जायां रूपान्तरणं कर्तुं शक्यते, तस्य संज्ञा पिङ्गलः अस्ति, अयं प्रतीयते। पंचतन्त्रे कथनमस्ति यत् छन्दःशास्त्रस्य रचनाकारं पिङ्गलं मकर नामक जलजन्तुः व्यापादितवान् ( पंचतन्त्र 2.35 )। अयं कथनं न केवलं स्थूलार्थस्य कथनमस्ति। ऊर्जायाः अव्यवस्थायाः निरोधस्य उपायं अस्ति यत् सर्वां ऊर्जां छन्दोभिः आबद्धं कुरु। तदा ऊर्जायाः अनुपयोगी भागः, यस्य संज्ञा ओंकारे मकारः भवति, न्यूनतमं भविष्यति। छन्द शब्द द्वारा न केवलं गायत्री, त्रिष्टुप आदि छन्दानां बोधं भवति, अपितु सर्वेषां भक्तीनां अपि बोधं भवति। न कोपि क्रिया भक्तिरहितं भवेत्, तत् छन्दोबद्धता।

 

अकारो जाग्रति नेत्रे वर्तते सर्वजन्तुषु । उकारः कण्ठतः स्वप्ने मकारो हृदि सुप्तितः ॥ ७४॥  विराड्विश्वः स्थूलश्चाकारः । हिरण्यगर्भस्तैजसः सूक्ष्मश्च उकारः । कारणाव्याकृतप्राज्ञश्च मकारः । अकारो राजसो रक्तो ब्रह्म चेतन उच्यते । उकारः सात्त्विकः शुक्लो विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ७५॥  मकारस्तामसः कृष्णो रुद्रश्चेति तथोच्यते । – योगचूडामण्युप.

 

तावद्रथेन गन्तव्यं यावद्रथपथि स्थितः । स्थित्वा रथपथस्थानं रथमुत्सृज्य गच्छति ॥ ३॥  मात्रालिङ्गपदं त्यक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम् । अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं च गच्छति ॥ ४॥ – अमृतनादोपनिषद

रोहिणीतनयो विश्व अकाराक्षरसंभवः ॥ १०॥ तैजसात्मकः प्रद्युम्न उकाराक्षरसंभवः । प्राज्ञात्मकोऽनिरुद्धोऽसौ मकाराक्षरसंभवः ॥ ११॥ अर्धमात्रात्मकः कृष्णो यस्मिन्विश्वं प्रतिष्ठितम् । – गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद

अकारादभवद्ब्रह्मा जाम्बवानितिसंज्ञकः ।

उकाराक्षरसंभूत उपेन्द्रो हरिनायकः ॥ १॥

 

मकाराक्षरसंभूतः शिवस्तु हनुमान्स्मृतः ।

बिन्दुरीश्वरसंज्ञस्तु शत्रुघ्नश्चक्रराट् स्वयम् ॥ २॥

 

नादो महाप्रभुर्ज्ञेयो भरतः शङ्खनामकः ।

कलायाः पुरुषः साक्षाल्लक्ष्मणो धरणीधरः ॥ ३॥

 

कलातीता भगवती स्वयं सीतेति संज्ञिता ।

तत्परः परमात्मा च श्रीरामः पुरुषोत्तमः ॥ ४॥ – तारसारोपनिषद

 

अकारेणेममात्मानमन्विष्य मकारेण ब्रह्मणानु- सन्दध्यादुकारेणाविचिकित्सन्नशरीरोऽनिन्द्रियोऽप्राणोऽतमाः सच्चिदानन्दमात्रः स स्वराड् भवति य एवं वेद – – – — तस्मादकारेण परमं ब्रह्मान्विष्य मकारेण मन आद्यवितारं मन आदिसाक्षिण- मन्विच्छेत् – नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद

 

ते क्रमेण षोडशमात्रारूढाः अकारे जाग्रद्विश्व उकारे जाग्रत्तैजसो मकारे जाग्रत्प्राज्ञ अर्धमात्रायां जाग्रत्तुरीयो बिन्दौ स्वप्नविश्वोनादे स्वप्नतैजसः कलायां स्वप्नप्राज्ञः कलातीते स्वप्नतुरीयः शान्तौ सुषुप्तविश्वः शान्त्यतीते सुषुप्ततैजस उन्मन्यां सुषुप्तप्राज्ञो मनोन्मन्यां सुषुप्ततुरीयः तुर्यां तुरीयविश्वोमध्यमायां तुरीयतैजसः पश्यन्त्यां तुरीयप्राज्ञः परायां तुरीयतुरीयः । जाग्रन्मात्राचतुष्टयमकारांशं स्वप्नमात्राचतुष्टयमुकारांशं सुषुप्तिमात्राचतुष्टयं मकारांशं तुरीयमात्राचतुष्टयमर्धमात्रांशम् । अयमेव ब्रह्मप्रणवः । – परमहंसपरिव्राजकोपनिषद

अकारेवह्निरित्याहुरुकारे हृदि संस्थितः ॥ ६९॥  मकारे च भ्रुवोर्मध्ये प्राणशक्त्या प्रबोधयेत् । ब्रह्मग्रन्थिरकारे च विष्णुग्रन्थिर्हृदि स्थितः ॥ ७०॥  रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये भिद्यतेऽक्षरवायुना । अकारे संस्थितो ब्रह्मा उकारे विष्णुरास्थितः ॥ ७१॥  मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्तः परात्परः । – ब्रह्मबिन्दूपनिषद

ऊर्ध्वनालमधोबिन्दुस्तस्य मध्ये स्थितं मनः । अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव भिद्यते ॥ १३८॥  मकारे लभते नादमर्धमात्रा तु निश्चला । – योगतत्त्वोपनिषद

 

http://astrology.raftaar.in/Astro/Daily-Horoscope/Hindi-Prediction/makar-Rashi

 

मकर राशि का स्वामी ग्रह शनि होता है। भगवान शनि देव और हनुमान जी को मकर राशि का आराध्य देव माना जाता है।

 

 

Vedic Astrology

Capricorn is represented as Unicorn, an extinct animal, but one that has special significance in ancient myths. Capricorn is known as Makar in Sanskrit denoting the pentagon, which symbolizes microcosm. This sign is said to represent simultaneously the microcosm, the human body, and the macrocosm, the world of external objects of perception. It is under this sign of the zodiac that unity between the inner man and the outer Cosmic Man begins to be established.

 

Esoteric Meaning of Capricorn

Posted on July 24, 2013 by elange610

 

The flashes of intuition with which he is becoming familiar change into the blazing and constant light of the soul, irradiating the mind and providing that point of fusion which must ever be the “fusion of the two lights, the greater and the lesser light.” The light of the personality and the light of the soul blend.

 

http://www.light-weaver.com/astrology/astr1060.html

it, therefore, relates man to the mineral kingdom; it is also the sign of the Crocodiles which live half in the water and half on dry land; it is spiritually the sign of the Unicorn which is the “fighting and triumphant creature” of the ancient myths. Under the symbolism of the above creatures, this sign gives us a rather complete picture of man with his feet upon the earth, yet running free and climbing to the heights of worldly ambition or of spiritual aspiration in search of what he realizes (at any particular time) to be his major need.- – — — — –

Then Capricorn, the Goat, related particularly and closely to Aries, but hiding (as an esoteric blind) the symbolism of the Unicorn in which the two horns and the single eye are blended and depicted by the long straight horn of the unicorn in the center of the forehead

http://www.light-weaver.com/astrology/astr1065.html

Jupiter, which has been the ruler of Pisces and also of Aquarius, falls in this sign. This fall must be studied from two angles, for Jupiter in its lowest aspect gives the fulfilment of desire and satisfied demand, whilst in its highest Jupiter is the outgoing expression of love,

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